यूपी में एनकाउंटर नीति पर विवाद, कोर्ट नियमों का मुद्दा गर्म

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👉 यूपी में 16,285 एनकाउंटर पर बड़ा सवाल ,हाईकोर्ट–सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के उल्लंघन का आरोप.

👉 शामली जेल के ‘हाफ एनकाउंटर’ खुलासे से हड़कंप..

👉 पूरे प्रदेश में एक जैसे तरीके से कार्रवाई का दावा ,उच्च स्तरीय न्यायिक जांच की मांग तेज…

कौशाम्बी/प्रयागराज । उत्तर प्रदेश में मार्च 2017 से अब तक हुए 16,285 पुलिस एनकाउंटरों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि इनमें से केवल 10–16 एनकाउंटर ही वास्तविक थे, जबकि शेष मामलों में मुठभेड़ की आड़ में फर्जी कार्रवाई की गई। अब इस पूरे मामले को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के संदर्भ में देखा जा रहा है।कानूनी जानकारों के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी एनकाउंटर रोकने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन गाइडलाइनों के अनुसार—किसी भी एनकाउंटर में मौत या गंभीर चोट की स्थिति में स्वतंत्र एजेंसी से FIR और जांच अनिवार्य है।पुलिस पार्टी से अलग स्वतंत्र मजिस्ट्रियल जांच कराई जानी चाहिए।एनकाउंटर में शामिल पुलिसकर्मियों के हथियार जब्त कर फॉरेंसिक जांच कराई जाए।पीड़ित या मृतक के परिजनों को निष्पक्ष जांच का अधिकार है।जांच पूरी होने तक संबंधित पुलिसकर्मियों को पदस्थापना लाभ नहीं दिया जाना चाहिए।

इसी तरह इलाहाबाद हाई कोर्ट भी समय-समय पर यह कहता रहा है कि कानून से ऊपर कोई नहीं, और पुलिस आत्मरक्षा के नाम पर मनमानी नहीं कर सकती।इन आरोपों को और बल तब मिला जब हाल ही में शामली जेल में एक कैदी ने जज के सामने तथाकथित “हाफ एनकाउंटर” की बात रखी। कैदी के अनुसार उसे डराने, दबाव बनाने और बयान बदलवाने के लिए गोली मारी गई, लेकिन जानबूझकर मारा नहीं गया। अब दावा किया जा रहा है कि यही तरीका पूरे प्रदेश में अपनाया जा रहा है—डर पैदा करना, वसूली करना और फिर मामले को पुलिस कार्रवाई बताना।आरोप यह भी हैं कि कई मामलों में पुलिस खुद ही तमंचा या कट्टा पीड़ित के हाथ में थमा देती है और बाद में एनकाउंटर की कहानी गढ़ दी जाती है। इस प्रक्रिया में न सिर्फ कानून का उल्लंघन होता है, बल्कि सरकारी शक्ति का दुरुपयोग कर अवैध कमाई भी की जाती है।इन तमाम तथ्यों और आरोपों के बीच अब मांग तेज हो गई है कि मार्च 2017 से अब तक हुए सभी एनकाउंटरों की उच्च स्तरीय, स्वतंत्र और न्यायिक जांच कराई जाए, ताकि यह साफ हो सके कि कितने मामले वास्तव में आत्मरक्षा थे और कितने मामलों में अदालतों की गाइडलाइन को दरकिनार कर कानून की आड़ में मनमानी की गई।

कौशांबी–प्रयागराज में भी ‘हाफ एनकाउंटर’ पर लगातार सवाल, पुलिस कार्यशैली पर उठती रही हैं उंगलियां..

कौशांबी और प्रयागराज में भी पुलिस द्वारा किए गए तथाकथित हाफ एनकाउंटर को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि कई मामलों में पुलिस संदिग्धों को घर से या रास्ते से उठाकर ले जाती है और फिर किसी सुनसान इलाके में ले जाकर मुठभेड़ दिखा दी जाती है।
आरोप यह भी हैं कि घटनास्थल पर पहले से कट्टा या तमंचा पड़ा दिखाकर और बाइक खड़ी कर पूरे मामले को मुठभेड़ का रूप दे दिया जाता है। इसके बाद पुलिस अपनी कार्रवाई को बड़ी सफलता बताकर मीडिया में सुर्खियां बटोरती है और इसी के आधार पर आउट ऑफ टर्न प्रमोशन जैसी सुविधाएं लेने का प्रयास किया जाता है।
कौशांबी में भी ऐसे कई मामलों में जनता के बीच यह चर्चा रही है कि एनकाउंटर की कहानी पहले से तय स्क्रिप्ट पर चलती है, जबकि वास्तविकता कुछ और होती है। लोगों का कहना है कि यदि इन मामलों की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो कई तथाकथित मुठभेड़ों की सच्चाई सामने आ सकती है।
इन आरोपों के चलते दोनों जिलों में समय-समय पर यह मांग उठती रही है कि पुलिस द्वारा किए गए एनकाउंटरों और हाफ एनकाउंटर मामलों की स्वतंत्र और उच्च स्तरीय जांच कराई जाए, ताकि कानून के नाम पर हो रही कथित मनमानी पर रोक लग सके और जनता का भरोसा बना रहे।

अमरनाथ झा पत्रकार – 9415254415

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