क्या भारत भूमि कानूनों में आज भी गुलाम है ? ,1969 में खत्म हो चुकी थी जमीन की लीज़, फिर मालिक कैसे बने लोग ? Land Revenue Rules 1921–1972 ने खोले बड़े राज़, आदिवासी भूमि अधिकारों पर नई बहस

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क्या भारत आज भी भूमि कानूनों में गुलाम है ? 
👉 1969 में खत्म हुई ज़मीन की लीज़ ,फिर भी मालिक बने लोग!
Land Revenue Rules 1921–1972 ने खोले चौंकाने वाले राज़
👉 आदिवासी भूमि अधिकारों पर बहस और तेज़ हुई
गैर-आदिवासियों के कब्ज़े पर उठ रहे सवाल, सरकार से जवाब, विशेषज्ञों से पुनर्विचार की मांग बढ़ी..

ईदेश को आज़ाद हुए दशकों बीत चुके हैं, लेकिन भूमि कानूनों से जुड़े दस्तावेज़ एक चौंकाने वाली तस्वीर पेश कर रहे हैं। Land Revenue Rules (भू-राजस्व नियम) 1921 और 1972 के प्रावधानों के आधार पर यह दावा सामने आया है कि भारत में गैर-आदिवासियों को दी गई ज़मीन कभी भी स्थायी रूप से उनकी नहीं थी, बल्कि केवल 99 वर्ष की लीज़ पर दी गई थी, जो वर्ष 1969 में समाप्त हो चुकी है।
सरकारी किताब में लिखा है — यह नियम गुप्त नहीं हैं
Land Revenue Rules की भूमिका (Preface) में सरकार स्वयं यह स्वीकार करती है कि इस पुस्तक को आम जनता से छुपाने का कोई कारण नहीं है और जो भी व्यक्ति भूमि संपत्ति में रुचि रखता है, उसे यह जानकारी मिलनी चाहिए।
इसके बावजूद आरोप है कि:
यह नियम आम नागरिकों तक नहीं पहुँचाए गए
सरकारी विभागों में भी इन पर खुली चर्चा नहीं हुई
ज़मीन की खरीद-फरोख्त इन नियमों की जानकारी के बिना कराई गई
जमीन बेची नहीं गई, सिर्फ लीज़ पर दी गई
दस्तावेज़ों के अनुसार, अंग्रेजी शासनकाल में बाहर से आए लोगों को भारत में ज़मीन का मालिकाना अधिकार नहीं दिया गया। उन्हें केवल लीज़ (किराए जैसा अधिकार) मिला।
नियम स्पष्ट करते हैं कि:
अधिकतम लीज़ अवधि 99 वर्ष तय थी
यह स्थायी या पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाला अधिकार नहीं था
असली मालिक मूल निवासी और आदिवासी समुदाय ही माने गए
एक ही तारीख़ पर खत्म हुई सभी लीज़ — 1969
Land Revenue Rules के पेज 292 (1921) और पेज 396 (1972) में दिए उदाहरण बताते हैं कि:
1870 में दी गई 99 वर्ष की लीज़ 1969 में खत्म होती है
1900 में दी गई लीज़ भी 1969 तक ही मान्य मानी गई
यानी अलग-अलग समय पर दी गई ज़मीन की लीज़ भी एक ही वर्ष में समाप्त मानी गई।
संविधान के बाद भी स्थायी मालिकाना नहीं
दस्तावेज़ों में यह भी दर्ज है कि:
1950 में संविधान लागू होने के बाद भी
गैर-आदिवासियों को अधिकतम 19 वर्ष की ही लीज़ दी जा सकती थी
इससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या संविधान लागू होने से ज़मीन का मालिकाना अपने-आप मिल गया था?
Renewal सिर्फ अनुमान, कोई कानूनी आदेश नहीं
नियमों में 1969 के बाद लीज़ नवीनीकरण को लेकर सिर्फ यह लिखा गया है कि “ऐसा मान लिया जाए” कि लीज़ renew कर दी जाएँगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि:
यह कोई कानूनी आदेश नहीं
केवल एक अनुमान (assumption) है
नवीनीकरण का कोई लिखित अधिकार नहीं दिया गया
आदिवासी समाज ने Renewal नहीं दी — दावा
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा दावा यह है कि:
1969 के बाद
आदिवासी और मूल निवासी समाज ने
गैर-आदिवासियों की लीज़ का नवीनीकरण नहीं किया
इसके बावजूद ज़मीन पर कब्ज़ा और मालिकाना दावा आज भी जारी है।
भूमि कानूनों पर पुनर्विचार की मांग तेज
इस खुलासे के बाद देशभर में सवाल उठ रहे हैं:
क्या भारत भूमि व्यवस्था में अब भी औपनिवेशिक ढांचे में फंसा है?
क्या आदिवासी भूमि अधिकारों के साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ है?
क्या Land Revenue Rules की संवैधानिक और कानूनी समीक्षा जरूरी है?
विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों ने सरकार से इस पूरे विषय पर श्वेत पत्र लाने और खुली बहस कराने की मांग की है।
एक पंक्ति में सवाल
अगर जमीन की लीज़ 1969 में खत्म हो गई थी, तो आज ज़मीन का मालिक कौन है?

अमरनाथ झा पत्रकार – 9415254415, 8318977396

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