चित्रकूट पुलिस का कारनामा,नौ दिन से न्याय के लिए भटक रहा दलित व्यक्ति,6-बार थाने और 2 बार सीओ कार्यालय पहुंचा, फिर भी FIR नहीं
👉 पहली तहरीर से ₹1,500 छीने जाने की बात हटवाने का आरोप, दूसरी तहरीर के बाद भी कार्रवाई शून्य..
👉 आरोपियों की मौजूदगी में 28 अक्टूबर को पीड़ित को थाने बुलाकर फिर तहरीर बदलवाने का आरोप, इंस्पेक्टर तिवारी पर डांटकर भगाने का आरोप..
👉 26 और 27 दो दिन गया पीड़ित सीओ ऑफिस , वहां भी आरोपी को पहले से सीओ के चैंबर में बैठाया गया और पीड़ित को घंटों बाहर कराया गया इंतजार..पीड़ित को दौड़ाकर किया जा रहा परेशान ,सीओ की भूमिका पर उठे रहे सवाल…
👉 सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि SC/ST एक्ट की धारा 18-A-1 के तहत कोई भी प्रिमिलरी इंक्वायरी का प्रावधान नहीं , पुलिस इस एक्ट का कर रही उल्लंघन..
चित्रकूट। दलित उत्पीड़न और पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। अनुसूचित जाति के जयलाल सरोज का आरोप है कि थाना राजपुर के मंडी में लखन केसरवानी ने उसे दुकान पर ले जाकर कई लोग बेरहमी से पीटा, जातिसूचक गालियां दीं और जान से मारने की धमकी दी। मारपीट के दौरान वह बेहोश हो गया तो आरोपियों ने उसे दुकान के अंदर बंद कर दिया। पीड़ित का आरोप है कि उसके पास रखे 1,500 रुपये भी छीन लिए गए। घटना 19 अक्टूबर 2026 की सुबह करीब 11 बजे राजापुर थाना क्षेत्र की मंडी की बताई जा रही है।
पीड़ित जयलाल सरोज पुत्र मिट्ठू सरोज, निवासी बैरमपुर, थाना पश्चिम शरीरा, कौशांबी के अनुसार पवन केसरवानी और लखन केसरवानी उसे जबरन दुकान पर ले गए और मारपीट की। बीच-बचाव करने पहुंची एक महिला को भी डांटकर भगा दिया गया। घटना के अगले दिन पुलिस ने उसका सरकारी अस्पताल में मेडिकल परीक्षण कराया, लेकिन आरोप है कि मेडिकल और पहली तहरीर उपलब्ध होने के बावजूद पुलिस ने अब तक प्राथमिकी दर्ज नहीं की।
तहरीर बदलवाने का दबाव, फिर भी नहीं लिखी रिपोर्ट!
पीड़ित का सबसे गंभीर आरोप पुलिस की कार्यशैली को लेकर है। उसका कहना है कि पहली तहरीर में 1,500 रुपये छीने जाने की बात लिखी थी, लेकिन पुलिसकर्मियों ने कथित तौर पर यह तथ्य हटवाकर गिर जाने की बात लिखने का दबाव बनाया। यहां तक कहा गया कि रुपये छीने जाने की बात हटाकर गिरने की बात लिखने पर ही रिपोर्ट दर्ज होगी और रुपये बरामद करा दिए जाएंगे। पुलिस के कहने पर दूसरी तहरीर देने के बावजूद प्राथमिकी दर्ज नहीं हुई।
छह बार थाना, दो बार सीओ कार्यालय के चक्कर, फिर भी न्याय नहीं!….
पीड़ित के मुताबिक वह अब तक 6 बार राजापुर थाने और दो बार क्षेत्राधिकारी कार्यालय राजपुर के चक्कर लगा चुका है कई कई घंटों बैठाये रखा गया है । 27 अक्टूबर को भी वह सीओ कार्यालय पहुंचा था। आरोप है कि वहां पहले से ही नामजद आरोपी मौजूद थे। बाद में थाने से दरोगा रविन्द्र कटियार से फोन कर उसे इंस्पेक्टर तिवारी से मिलने के लिए बुलाया गया। पीड़ित का आरोप है कि थाने पहुंचने पर इंस्पेक्टर ने फिर तहरीर बदलवाई और कार्रवाई करने के बजाय उसे डांटकर भगा दिया। पीड़ित ने पुलिस पर आरोपियों से मिलीभगत की आशंका भी जताई है।
सीसीटीवी फुटेज से खुल सकती है पुलिस की कार्यशैली की पोल!…
पीड़ित ने थाने और सीओ कार्यालय में अपनी बार-बार की मौजूदगी का हवाला देते हुए वहां के सीसीटीवी फुटेज की जांच कराने की मांग की है। साथ ही मंडी में घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज सुरक्षित कराकर जांच कराने की मांग की है, जिससे मारपीट और घटनाक्रम की सच्चाई सामने आ सके।
अब पीड़ित ने 29 अक्टूबर को पुलिस अधीक्षक चित्रकूट और उच्च अधिकारियों को पत्र भेजकर पहली और दूसरी तहरीर, मेडिकल रिपोर्ट, बयान तथा सीसीटीवी फुटेज के आधार पर निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। साथ ही अनुसूचित जाति के व्यक्ति के साथ कथित जातिसूचक अपमान और मारपीट के मामले में एससी-एसटी अधिनियम के तहत विधिक कार्रवाई की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि SC/ST एक्ट की धारा 18-A-1 में कोई भी प्रिमिलरी इंक्वायरी का प्रावधान नहीं है ।
सवाल यह है कि जब पीड़ित के पास पहली तहरीर की प्राप्ति रसीद और मेडिकल परीक्षण के अभिलेख मौजूद हैं, तो नौ दिन बाद भी प्राथमिकी दर्ज करने और निष्पक्ष जांच की स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं है? क्या पुलिस पीड़ित की शिकायत पर कार्रवाई करेगी या उसे इसी तरह थाने और अधिकारियों के कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ेंगे?
अमरनाथ झा पत्रकार – 9415254415
