राजापुर -चित्रकूट में 948 ग्राम गांजा के साथ कौशाम्बी का युवक गिरफ्तार, बाइक और दो मोबाइल भी बरामद
👉 राजापुर थाना पुलिस की कार्रवाई, अ0संख्या 228/26 एनडीपीएस अधिनियम की धारा 8 और 20 के तहत मुकदमा दर्ज,
चित्रकूट। राजापुर थाना पुलिस ने मादक पदार्थों की तस्करी के खिलाफ कार्रवाई करते हुए 948 ग्राम अवैध गांजा के साथ कौशाम्बी के कुम्हियावा निवासी करीब 40 वर्षीय युवक को गिरफ्तार करने का दावा किया है। पुलिस ने अपराध संख्या 228/26 दर्ज कर आरोपी के कब्जे से गांजा के अलावा 420 रुपये नकद, दो मोबाइल फोन और एक काले रंग की होंडा शाइन मोटरसाइकिल बरामद की है। मोटरसाइकिल की नंबर प्लेट अधूरी होने और वाहन से संबंधित कागजात प्रस्तुत नहीं किए जाने के कारण पुलिस ने उसे मोटर वाहन अधिनियम की धारा 207 के तहत सीज करने की कार्रवाई भी की।
👉 मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने की कार्रवाई…
पुलिस की प्रथम सूचना रिपोर्ट के मुताबिक, 28 सितंबर 2026 को राजापुर थाने में रपट संख्या आठ के तहत दर्ज विवरण में बताया गया है कि उपनिरीक्षक शैलेन्द्र कुमार सिंह पुलिसकर्मियों के साथ क्षेत्र में गश्त और अपराधियों की तलाश कर रहे थे। इसी दौरान मुखबिर से सूचना मिली कि रामवन गमन पथ बाईपास के पास करीब 40 वर्ष का एक व्यक्ति मोटरसाइकिल से गांजा की आपूर्ति करने आया है।
सूचना पर विश्वास करते हुए पुलिस टीम ने बताए गए इलाके में निगरानी शुरू की। पुलिसकर्मियों के मुताबिक, मिश्रनपुरवा फ्लाईओवर से आगे बढ़ते हुए वे रमपुरिया अव्वल की तरफ जा रहे थे। इसी दौरान एक लिंक मार्ग पर मोटरसाइकिल के साथ अकेला व्यक्ति दिखाई दिया। मुखबिर की सूचना के आधार पर उसे संदिग्ध मानकर पुलिस टीम ने रोककर पूछताछ और तलाशी की कार्रवाई की।
👉 मोटरसाइकिल पर टंगे झोले से मिला गांजा…
प्राथमिकी में दर्ज विवरण के अनुसार, मोटरसाइकिल की दाहिनी तरफ टंगे कपड़े के थैले में सफेद प्लास्टिक की थैली रखी थी। तलाशी के दौरान उसमें गांजा जैसा पदार्थ मिलने की बात कही गई है। पुलिस ने उसका वजन 948 ग्राम दर्ज किया है। बरामद पदार्थ को सफेद प्लास्टिक की थैली और सफेद झोले में रखकर नियमानुसार नमूना परीक्षण की कार्रवाई का उल्लेख किया गया है।
पुलिस अभिलेख के मुताबिक, आरोपी की जामा तलाशी के दौरान 420 रुपये नकद और दो मोबाइल फोन मिले। इनमें एक बड़ा टच स्क्रीन मोबाइल और दूसरा छोटा कीपैड मोबाइल बताया गया है। बरामद नकदी और मोबाइल फोन को अलग से सुरक्षित करने का भी उल्लेख प्राथमिकी में है।
👉 राजपत्रित अधिकारी की मौजूदगी में तलाशी का उल्लेख…
प्राथमिकी के अनुसार, पुलिस ने आरोपी को अपराध और तलाशी से संबंधित कानूनी अधिकारों की जानकारी दी। इसके बाद क्षेत्राधिकारी के मौके पर पहुंचने पर राजपत्रित अधिकारी की मौजूदगी में तलाशी और जब्ती की कार्रवाई पूरी किए जाने का उल्लेख किया गया है। पुलिस ने बरामदगी और गिरफ्तारी से संबंधित दस्तावेज तैयार कर संबंधित लोगों के हस्ताक्षर कराने की बात भी दर्ज की है।
पुलिस के मुताबिक, आरोपी की गिरफ्तारी रामवन गमन पथ बाईपास से राजापुर-खटवारा नहर की ओर जाने वाले कच्चे संपर्क मार्ग पर खटवारा और मिश्रनपुरवा के आसपास की गई। गिरफ्तारी के दौरान आरोपी की ओर से किसी प्रकार का अवरोध नहीं किए जाने का भी उल्लेख है।
👉 अधूरे नंबर और कागजात न मिलने पर बाइक सीज
बरामद मोटरसाइकिल काले रंग की होंडा शाइन बताई गई है। प्राथमिकी के अनुसार, बाइक की नंबर प्लेट अधूरी थी और नेटवर्क संबंधी समस्या के कारण वाहन का विवरण तत्काल प्राप्त नहीं हो सका। वाहन से संबंधित कागजात भी प्रस्तुत नहीं किए गए। इसके बाद पुलिस ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 207 के तहत मोटरसाइकिल सीज करने की कार्रवाई दर्ज की।
पुलिस ने यह भी उल्लेख किया है कि घटनास्थल सुनसान और राजमार्ग के पास होने के कारण कार्रवाई के दौरान कोई स्वतंत्र स्थानीय गवाह उपलब्ध नहीं हो सका। गिरफ्तारी और बरामदगी की कार्रवाई में माननीय सर्वोच्च न्यायालय तथा मानवाधिकार आयोग के दिशा-निर्देशों का पालन किए जाने की बात भी रिपोर्ट में दर्ज है।
👉 कौशाम्बी के महेवाघाट क्षेत्र का निवासी है आरोपी
प्राथमिकी के अंतिम पृष्ठ पर आरोपी का नाम महेन्द्र कुमार, पुत्र रामलखन मौर्य, उम्र करीब 40 वर्ष, निवासी कुम्हियावां, थाना महेवाघाट, जनपद कौशाम्बी दर्ज दिखाई देता है। आरोपी के परिजन को गिरफ्तारी की सूचना देने के लिए फोन से संपर्क किए जाने का भी उल्लेख किया गया है।
इस मामले में पुलिस ने एनडीपीएस अधिनियम की धारा 8/20 के तहत कार्रवाई दर्ज की है। धारा 8 मादक पदार्थों से संबंधित प्रतिबंधित गतिविधियों पर रोक लगाती है, जबकि धारा 20 गांजे से संबंधित अपराधों और उनके दंड से जुड़ी है। मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच, बरामद पदार्थ की प्रयोगशाला रिपोर्ट और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही निकलेगा।
यह खबर उपलब्ध प्राथमिकी के पृष्ठों पर दर्ज विवरण के आधार पर तैयार की गई है। मुकदमा संख्या, गिरफ्तारी की सटीक समयावधि और प्रयोगशाला जांच के परिणाम की पुष्टि मूल प्राथमिकी के शेष पृष्ठों के आधार पर होनी चाहिए।
प्राथमिकी के पृष्ठों को देखकर पुलिस की कार्रवाई में कुछ ऐसे बिंदु सामने आते हैं, जिनकी कानूनी वैधता, दस्तावेजी प्रमाण और आपसी संगति की जांच कराना जरूरी है। लेकिन किसी बात का प्राथमिकी में लिखा होना अपने आप में उसे सही साबित नहीं करता, और किसी प्रक्रिया का विवरण न दिखना भी अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पुलिस ने फर्जी कार्रवाई की है।
इस मामले में सबसे जरूरी सवाल हैं—गांजे की बरामदगी कहां और कैसे हुई, तलाशी की कानूनी प्रक्रिया क्या अपनाई गई, स्वतंत्र गवाह क्यों नहीं मिले, बरामदगी का नमूना किसके सामने सील हुआ और पूरी कार्रवाई के दस्तावेज एक-दूसरे से मेल खाते हैं या नहीं।
1. प्राथमिकी में पुलिस की कार्रवाई पर उठने वाले प्रमुख सवाल
1. क्या आरोपी को तलाशी से पहले उसके कानूनी अधिकार बताए गए?
प्राथमिकी में एक तरफ मोटरसाइकिल पर टंगे झोले से गांजा मिलने की बात है, दूसरी तरफ आरोपी की जामा तलाशी में नकदी और मोबाइल मिलने का उल्लेख है। यदि पुलिस ने आरोपी के शरीर और झोले, दोनों की तलाशी ली, तो एनडीपीएस अधिनियम की धारा 50 के अनुपालन का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है।
पुलिस से पूछा जाना चाहिए कि क्या तलाशी से पहले आरोपी को राजपत्रित अधिकारी या मजिस्ट्रेट के समक्ष तलाशी कराने का कानूनी अधिकार बताया गया था? क्या इस संबंध में लिखित सूचना या मेमो तैयार हुआ था? केवल बाद में किसी राजपत्रित अधिकारी का मौके पर पहुंचना इस सवाल का अपने आप जवाब नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के State of Punjab v. Baljinder Singh और State of Punjab v. Parmanand संबंधी सिद्धांतों के अनुसार, धारा 50 की प्रयोज्यता तलाशी की वास्तविक परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
2. स्वतंत्र गवाह क्यों नहीं मिले?
प्राथमिकी में बताया गया है कि घटनास्थल सुनसान था और कोई स्वतंत्र गवाह उपलब्ध नहीं हुआ। लेकिन उसी विवरण में बाईपास, फ्लाईओवर और संपर्क मार्ग का उल्लेख है।
यह अपने आप में पुलिस की अवैध कार्रवाई साबित नहीं करता। फिर भी जांच का सवाल है कि आसपास से गुजरने वाले वाहन चालकों, राहगीरों या नजदीकी गांव के लोगों को गवाह बनाने का प्रयास किया गया था या नहीं? यदि प्रयास किया गया, तो उसका उल्लेख किस दस्तावेज में है?
जांच का आधार: घटनास्थल का नक्शा, तलाशी मेमो, गवाहों के बयान और पुलिस दल की रवानगी तथा वापसी की जीडी प्रविष्टियां।
3. मुखबिर की सूचना का लिखित रिकॉर्ड कहां है?
रिपोर्ट में मुखबिर से सूचना मिलने के बाद पुलिस टीम द्वारा कार्रवाई किए जाने की बात है। यह देखना होगा कि सूचना किस समय मिली, उसे किस अधिकारी ने दर्ज किया और वरिष्ठ अधिकारी को कब भेजा गया।
यहां एक जरूरी कानूनी अंतर है: यदि कार्रवाई सार्वजनिक स्थान पर मादक पदार्थ की बरामदगी से संबंधित है, तो धारा 43 लागू हो सकती है। धारा 42 की सूचना दर्ज करने और 72 घंटे में वरिष्ठ अधिकारी को प्रति भेजने वाली शर्त हर सार्वजनिक स्थान की तलाशी पर स्वतः लागू नहीं होती। इसलिए सिर्फ प्राथमिकी में सूचना की लिखित प्रति का उल्लेख न होने से कानून का उल्लंघन साबित नहीं होता।
जांच का सवाल: क्या पुलिस की कार्रवाई धारा 43 के अंतर्गत थी, या किसी ऐसे बंद स्थान/वाहन की तलाशी भी हुई जिस पर धारा 42 लागू होती है?
4. 948 ग्राम गांजे का वजन और नमूना लेने की प्रक्रिया सत्यापित होनी चाहिए…
प्राथमिकी में 948 ग्राम पदार्थ मिलने का उल्लेख है। सिर्फ प्राथमिकी से यह प्रमाणित नहीं होता कि वजन वास्तव में इसी मात्रा का था या नमूना लेने के बाद जब्त माल किस स्थिति में रखा गया।
इन अभिलेखों की जांच जरूरी है:
वजन करने की कार्रवाई और वजन पर्ची।
नमूना लेने का मेमो और नमूने का वजन।
इस्तेमाल की गई सील का नमूना और सील किसके कब्जे में रही।
मालखाना रजिस्टर की प्रविष्टि।
फॉरेंसिक प्रयोगशाला की रसीद और परीक्षण रिपोर्ट।
धारा 52ए के अंतर्गत मजिस्ट्रेट के समक्ष सूची, फोटो और नमूने की प्रमाणन प्रक्रिया से जुड़े अभिलेख।
इन दस्तावेजों में वजन, पैकेट संख्या या सील का विवरण अलग-अलग मिलता है तो यह महत्वपूर्ण विरोधाभास हो सकता है। हालांकि, नमूना लेने में हर प्रक्रियागत कमी से मुकदमा अपने आप समाप्त नहीं होता; उसके प्रभाव का आकलन साक्ष्यों के साथ होगा।
5. गिरफ्तारी और बरामदगी की रिपोर्ट वरिष्ठ अधिकारी को कब भेजी गई ?…
एनडीपीएस अधिनियम की धारा 57 के अनुसार, गिरफ्तारी या जब्ती करने वाले अधिकारी को 48 घंटे के भीतर अपने तत्काल वरिष्ठ अधिकारी को पूरी रिपोर्ट देनी होती है।
प्राथमिकी में गिरफ्तारी और जब्ती का वर्णन होना, धारा 57 के अंतर्गत अलग रिपोर्ट भेजे जाने का प्रमाण नहीं है। संबंधित रिपोर्ट, उसके प्रेषण का समय और प्राप्ति का रिकॉर्ड देखना जरूरी है।
6. प्राथमिकी में दर्ज विवरण और वास्तविक दस्तावेजों का मिलान
इस मामले में निम्न बिंदुओं की मूल अभिलेखों से पुष्टि होनी चाहिए:
मुखबिर की सूचना, पुलिस टीम की रवानगी और गिरफ्तारी के समय में कोई अंतर तो नहीं।
मौके पर राजपत्रित अधिकारी के पहुंचने का वास्तविक समय क्या था और तलाशी उससे पहले हुई या बाद में।
बरामदगी मेमो, गिरफ्तारी मेमो और प्राथमिकी में आरोपी का नाम, पिता का नाम, पता तथा बरामद माल का विवरण एक जैसा है या नहीं।
मोटरसाइकिल के नंबर, चेसिस और इंजन नंबर की जांच की गई या नहीं।
आरोपी को गिरफ्तारी का कारण बताया गया और परिजन को सूचना देने का रिकॉर्ड मौजूद है या नहीं।
यदि मूल अभिलेखों में परस्पर असंगत समय, बदला हुआ वजन, अलग सील नंबर या बाद में तैयार किए जाने के संकेत मिलते हैं, तो वे जांच योग्य ठोस विरोधाभास हो सकते हैं। केवल संदेह के आधार पर दस्तावेजों को मनगढ़ंत घोषित करना उचित नहीं होगा।
2. क्या पुलिस ने मनगढ़ंत रिपोर्ट लिखी है ?…
उपलब्ध तथ्यों के आधार पर अभी यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पुलिस ने मनगढ़ंत रिपोर्ट लिखी है। लेकिन नीचे के चार दस्तावेज सबसे महत्वपूर्ण हैं….
मूल तलाशी एवं बरामदगी मेमो।
राजपत्रित अधिकारी के मौके पर पहुंचने का रिकॉर्ड और तलाशी संबंधी दस्तावेज।
सील, मालखाना और फॉरेंसिक प्रयोगशाला से जुड़े अभिलेख।
धारा 57 के अंतर्गत वरिष्ठ अधिकारी को भेजी गई रिपोर्ट।
इनकी तुलना प्राथमिकी से करने पर यह पता लगाया जा सकता है कि कोई वास्तविक कानूनी उल्लंघन, गंभीर विरोधाभास या दस्तावेजी हेरफेर का संकेत मौजूद है या नहीं। यह सब मामले जांच के विषय है..
अमरनाथ झा पत्रकार – 9415254415
