CCTNS रिकॉर्ड में कई क्राइम नंबर गायब, मुकदमों के पंजीकरण पर उठे सवाल

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कौशाम्बी। थाना महेवाघाट के वर्ष 2026 के CCTNS रिकॉर्ड के अवलोकन में कई ऐसी अपराध संख्याएं सामने आई हैं जो क्रमवार पंजीकरण सूची में उपलब्ध नहीं हैं। रिकॉर्ड में दर्ज मुकदमों की संख्या और आवंटित अपराध संख्या के बीच अंतर दिखाई देने से अभिलेखों की पारदर्शिता और मुकदमा पंजीकरण प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं।

उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार जनवरी 2026 में अपराध संख्या 001 से 0018 तक मुकदमे दर्ज दर्शाए गए हैं, लेकिन अपराध संख्या 0010 सूची में उपलब्ध नहीं है। इसी प्रकार फरवरी माह में अपराध संख्या 0019 से 0039 तक दर्ज मामलों में 0030 गायब है। मार्च में 0041, 0044 और 0058, अप्रैल में 0063 और 0065, मई में 0075 और 0076, जबकि जून माह में 0097, 0107 और 0109 अपराध संख्या रिकॉर्ड में दिखाई नहीं दे रही हैं।

रिकॉर्ड में अपराध संख्या आवंटन के क्रम को लेकर भी विसंगतियां सामने आई हैं। कुछ मामलों में बाद की तिथि की रिपोर्ट पहले और पहले की तिथि की रिपोर्ट बाद में दर्ज दिखाई दे रही है, जिससे अपराध संख्या आवंटन की प्रक्रिया को लेकर भी प्रश्न खड़े हो रहे हैं।

जून 2026 के रिकॉर्ड में 3 जून को दर्ज पुलिस मुठभेड़ से संबंधित एक मुकदमा भी सूची में मौजूद है, लेकिन कई अन्य अपराध संख्याओं के अनुपस्थित होने से पूरे रिकॉर्ड की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।

स्थानीय लोगों और शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि थाना महेवाघाट पुलिस कई मामलों में एफआईआर दर्ज करने के बजाय शिकायतों को लंबित रखती है, जिससे अपराध के वास्तविक आंकड़े कम दिखाई दें। उनका दावा है कि कई फरियादी थाने पहुंचे, लेकिन उनकी शिकायतों पर मुकदमा दर्ज नहीं किया गया। आरोप यह भी है कि कई-कई दिनों तक कोई नया मुकदमा दर्ज नहीं हुआ, जबकि क्षेत्र में लगातार विभिन्न घटनाएं होती रहीं।

सूत्रों का कहना है कि यदि पिछले छह माह के प्रार्थना पत्रों, जनसुनवाई पोर्टल, मुख्यमंत्री हेल्पलाइन, पुलिस कंट्रोल रूम तथा थाना जनरल डायरी (GD) रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच कराई जाए तो मुकदमा पंजीकरण से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं। इससे यह भी स्पष्ट हो सकता है कि वास्तविक शिकायतों और दर्ज मुकदमों के बीच कितना अंतर है।

हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और पुलिस विभाग की ओर से इस संबंध में कोई औपचारिक प्रतिक्रिया भी सामने नहीं आई है। यह भी संभव है कि कुछ अपराध संख्याएं तकनीकी कारणों, निरस्तीकरण या अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण रिकॉर्ड में प्रदर्शित न हो रही हों। ऐसे में मामले की वास्तविक स्थिति अभिलेखों की निष्पक्ष जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

— अमरनाथ झा, पत्रकार

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