जिला अस्पताल के सामने किराया माफिया बेलगाम, मरीजों की मजबूरी से लाखों की लूट, 50 से 80 हजार महीने की किराए की अवैध वसूली, क्लिनिक-पैथोलॉजी संचालकों से मनमाना किराया प्रशासन मौन, महंगे इलाज और टैक्स चोरी के आरोपों पर कौन देगा जवाब
👉 क्लिनिक और पैथोलॉजी संचालकों से मनमाने किराए, प्रशासन मौन , भारी किराया = महंगा इलाज, मरीजों की जेबों पर हमला , कैस वसूला जाता है किराया
👉 अवैध वसूली और टैक्स चोरी की आशंका, जांच की सख्त मांग , कौशाम्बी जिला अस्पताल के सामने चल रही दबंगई, कौन देगा जवाब?
रिपोर्ट – अमरनाथ झा पत्रकार
कौशाम्बी | जिला अस्पताल कौशाम्बी के सामने बने निजी मकानों में संचालित क्लिनिक, पैथोलॉजी और मेडिकल प्रतिष्ठानों से किराए के नाम पर मनमानी वसूली का मामला सामने आया है। सूत्रों के मुताबिक, यहां अस्पताल से सटी लोकेशन का फायदा उठाकर मकान मालिक हर महीने 50 हजार से लेकर 80 हजार रुपये तक किराया वसूल रहे हैं। सवाल यह है कि यह रकम वैध किराया है या मजबूरी का फायदा उठाकर की जा रही अवैध वसूली।
बताया जाता है कि जिला अस्पताल के आसपास जगह मिलने से मरीजों की आवाजाही सीधे होती है, इसलिए निजी चिकित्सक और स्वास्थ्य सेवाएं देने वाले संस्थान इसी इलाके में दुकान या भवन लेने को मजबूर होते हैं। इसी मजबूरी को आधार बनाकर कुछ मकान मालिक मनमाने किराए तय कर रहे हैं। कई मामलों में किरायानामा रजिस्टर्ड नहीं है या कागजों में कम और वास्तविकता में ज्यादा रकम वसूली जा रही है। भारी किराए का सीधा असर इलाज की लागत पर भी पड़ रहा है। सूत्रों के अनुसार, ज्यादा किराया देने के कारण निजी क्लिनिक और पैथोलॉजी जांच शुल्क बढ़ा रहे हैं, जिसका बोझ सीधे मरीजों पर पड़ता है। यह स्थिति Clinical Establishments Act की भावना के भी खिलाफ मानी जा रही है, जिसमें मरीजों के हितों से समझौता न करने की बात कही गई है।
किराए के इस खेल में टैक्स चोरी की आशंका भी गहराती जा रही है। 50 से 80 हजार रुपये मासिक किराया सालाना छह से दस लाख रुपये तक पहुंचता है। सवाल उठ रहा है कि क्या इतनी बड़ी आय को मकान मालिक अपने आयकर विवरण में दर्शा रहे हैं या नहीं। यदि ऐसा नहीं है तो यह सीधे तौर पर आयकर और स्टांप कानूनों का उल्लंघन माना जाएगा।
सबसे अहम सवाल जिला प्रशासन की भूमिका को लेकर खड़ा हो रहा है। क्या प्रशासन को इस वसूली की जानकारी नहीं है या फिर जानकारी होने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। न तो किरायानामों की जांच हुई और न ही टैक्स या स्टांप विभाग की ओर से कोई अभियान चलाया गया, जिससे मिलीभगत की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
इस पूरे मामले में अब जिला प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग उठने लगी है। स्थानीय लोगों और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े लोगों का कहना है कि जिला अस्पताल के आसपास बने भवनों के किरायानामों, आय और लाइसेंस की संयुक्त जांच कराई जाए। यदि वसूली अवैध पाई जाती है तो दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि इलाज के नाम पर चल रही यह ‘किराए की लूट’ रोकी जा सके।
A .N. Jha – 8318977396 ,9415254415
