प्रयागराज नगर निगम में सर्वे को लेकर मचा हड़कंप , निओ जिओ कंपनी के सर्वे पर उठे सवाल, जीआईएस सर्वे को बताया गया सरकार द्वारा दिया कार्य,निगम से नहीं हुआ भुगतान
👉 बिना नोटिस भेजे लोगों को थमाए जा रहे भारी-भरकम बिल , सर्वे की तारीख, प्रक्रिया और दरें सब पर बना है रहस्य ।
👉 कर्मचारियों पर पक्षपात और घोटाले के आरोप ,जनता परेशान, अधिकारी चुप, पारदर्शिता पर सवाल ।
👉 प्रयागराज नगर निगम में सर्वे घोटाले की बू, जनता परेशान, अधिकारी मौन
प्रयागराज । प्रयागराज नगर निगम में चल रहे संपत्ति सर्वे को लेकर गंभीर अनियमितताओं और पारदर्शिता की कमी उजागर हो रही है। जिस सर्वे का ठेका निओ जिओ इंफोटेक प्राइवेट लिमिटेड को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दिया गया, उस पर अब कई सवाल खड़े हो रहे हैं। नगर निगम के अधिकारी दावा करते हैं कि ठेका राज्य सरकार स्तर से दिया गया है और निगम को केवल एक पत्र भेजकर सर्वे कराने का आदेश मिला था। लेकिन इसके बावजूद सर्वे की प्रक्रिया, दरें, तरीके और मैपिंग से जुड़ी सूचनाएं न तो नगर निगम स्पष्ट कर पा रहा है, न ही सर्वे कर रही कंपनी। पहले भी सीटीओ पी0के द्विवेदी के समय हो चुका है जोन 6 और 3 में कई करोड़ों का टैक्स घोटाला ,जिसके बाद उनका ट्रांसफर कर दिया गया है ।

बड़ी समस्या यह है कि सर्वे किस वर्ष शुरू हुआ और कब खत्म हुआ, इस पर भी भ्रम की स्थिति है। जहां सीटीओ पी.के. मिश्रा दावा करते हैं कि सर्वे 2022 में शुरू हुआ और अब भी चल रहा है, वहीं न्यू जिओ के ग्रुप लीडर का कहना है कि सर्वे 2019 में शुरू होकर 2022 में समाप्त हो गया और रिपोर्ट नगर निगम को सौंप दी गई है। जनता के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि बिना किसी पूर्व नोटिस या सूचना के बिलों में भारी वृद्धि हो रही है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि मकान किसी और का है, रह रहा कोई और है, लेकिन टैक्स नोटिस तीसरे व्यक्ति को भेजा जा रहा है। इससे न सिर्फ भ्रम की स्थिति बनी हुई है, बल्कि आम नागरिक भीषण परेशानी में हैं। वहीं निगम में टी0एस0 राकेश नामक कर्मचारी पर विशेष कृपा होने के आरोप लगे हैं, जो कथित रूप से हर प्रक्रिया में अपनी भूमिका निभाता है। उसके खिलाफ पहले भी शिकायतें हो चुकी हैं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई और उसे कई जॉन का चार्ज तथा गाड़ी आदि भी दिया गया है।

फिलहाल, सवाल यह है कि जिस सर्वे के आधार पर टैक्स बढ़ाए जा रहे हैं, उसका प्रकाशन कब हुआ? कितनी आपत्तियां आईं? उनका निस्तारण कब और कैसे किया गया? धारा 208 के तहत क्या प्रक्रिया अपनाई गई? इन सभी सवालों पर नगर निगम के अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं।
जनता के बीच अब यह विश्वास तेजी से टूट रहा है कि क्या यह सर्वे प्रक्रिया पारदर्शी है, या फिर यह केवल एक और घोटाले की नींव है? प्रशासनिक लापरवाही और जवाबदेही की कमी ने इस पूरे मामले को विवादास्पद बना दिया है। अब देखना यह है कि उच्च अधिकारी इस ओर कब तक ध्यान देते हैं या यह ‘सर्वे घोटाला’ यूं ही चलता रहेगा।
अमरनाथ झा पत्रकार – 8318977396
