प्रयागराज आईटीआई और सेवायोजन कार्यालयों में भ्रष्टाचार चरम पर, पाकिस्तान भागे कर्मचारी को प्रमोशन, 438 अवैध नियुक्तियों की फाइलें दबीं

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Kaushambi voice

👉 प्रयागराज आईटीआई में नियुक्त बाबू अजय की अवैध नियुक्ति और प्रमोशन की शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं।

👉 2005 में चौकीदार के पद पर नियुक्त अजय को 2023 में प्रमोट कर प्रधान सहायक बना दिया गया।

👉 प्रदेश में सेवायोजन कार्यालय से हुईं 438 अवैध नियुक्तियां, अब तक सिर्फ एक पर कार्रवाई, बाकी पदोन्नति पाकर ऊंचे पदों पर।

👉 विभागीय फाइलें वर्षों से दबाई गईं, लखनऊ निदेशालय तक फैला भ्रष्टाचार का जाल।

👉 इटावा में मोहम्मद आसिफ खान नामक कर्मचारी 2007 से 2016 तक पाकिस्तान में रहकर फिर सेवा में हुआ बहाल, विभागीय लोगो पर उठा रहा सवाल 

👉 बिना जांच के जॉइनिंग, फिर प्रमोशन—सेवायोजन अधिकारी अरशद अली पर भी नहीं हुई कार्रवाई ।

👉 मुख्य सचिव को भेजे गए शपथ पत्र में किया गया खुलासा, लेकिन शासन अब तक मौन ,सरकार की चुप्पी और कार्रवाई न होना, प्रशासनिक ईमानदारी और पारदर्शिता पर बड़ा सवाल।

प्रयागराज/इटावा। उत्तर प्रदेश के औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई) और सेवायोजन कार्यालयों में भ्रष्टाचार इस हद तक पहुंच चुका है कि नियम, कानून और नैतिकता अब बेमानी हो चुके हैं। प्रयागराज से लेकर इटावा तक ऐसे मामलों की लंबी श्रृंखला है, जिनमें अवैध नियुक्तियां, फर्जी प्रमोशन और सेवा में बने रहने के लिए दस्तावेजों में हेराफेरी आम बात हो गई है। सरकार और विभागीय अफसरों की चुप्पी इन मामलों को और भी संदेहास्पद बना रही है।

प्रयागराज के आईटीआई में तैनात अमित यादव का मामला लंबे समय से चर्चा में है। वर्ष 2005 में चौकीदार राज श्रेणी में नियुक्त हुए अमित यादव की नियुक्ति को लेकर कई बार शिकायतें की गईं कि यह अवैध तरीके से हुई है, बावजूद इसके कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। उल्टा उसे पदोन्नत कर वरिष्ठ सहायक से प्रधान सहायक बना दिया गया और 1 फरवरी 2023 को प्रमोशन का पत्र भी जारी कर दिया गया।

इसी संस्थान में सेवायोजन कार्यालय के माध्यम से करीब 438 लोगों की अवैध नियुक्तियां की गईं, लेकिन अब तक सिर्फ एक व्यक्ति को निलंबित किया गया है। शेष 437 लोग आज भी विभिन्न उच्च पदों पर कार्यरत हैं और कई तो निदेशालय लखनऊ तक पहुंच चुके हैं। यह सवाल उठता है कि जब मामले की मीडिया में कई बार रिपोर्टिंग हुई, फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?

उधर, इटावा आईटीआई में तो भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा सामने आई है। यहां मोहम्मद आसिफ खान नामक कर्मचारी 2007 से 2016 तक बिना सूचना के विभाग से गायब रहा और पाकिस्तान चला गया। इतने वर्षों तक पाकिस्तान में रहने के बाद जब वह लौटकर आया तो उसे तत्कालीन सेवायोजन अधिकारी अरशद अली ने अवैध रूप से फिर से सेवा में बहाल कर दिया। कुछ वर्षों बाद उसे प्रमोशन भी दे दिया गया।

इस पूरे मामले की शिकायत एक अन्य कर्मचारी ने मुख्य सचिव को शपथ पत्र के माध्यम से की है, जिसमें स्पष्ट रूप से बताया गया है कि भगोड़े कर्मचारी को कैसे नियमों की अनदेखी कर फिर से सेवा में लाया गया और प्रमोशन तक दे दिया गया। न तो आसिफ खान पर कोई कार्रवाई हुई, न ही उसे जॉइन कराने और प्रमोट करने वाले अधिकारियों पर।

इन घटनाओं से यह स्पष्ट है कि आईटीआई और सेवायोजन कार्यालयों में नीचे से ऊपर तक पूरा तंत्र भ्रष्टाचार में संलिप्त है। न्यायालय में कई मामले विचाराधीन हैं, लेकिन विभागीय कार्रवाई अब तक ठप है। ऐसे में बड़ा सवाल उठता है कि क्या सरकार इन घोटालों को जानबूझकर नजरअंदाज कर रही है?

अब समय आ गया है कि प्रदेश सरकार इन मामलों पर गंभीरता दिखाए और एक स्वतंत्र जांच समिति का गठन कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे। वरना यह भ्रष्टाचार न केवल संस्थानों की साख को ध्वस्त करेगा, बल्कि ईमानदार कर्मचारियों के भविष्य के लिए भी खतरा बन जाएगा।

 

प्रयागराज: नैनी आईटीआई में भ्रष्टाचार की खुली पोल , फर्जी नियुक्तियों पर चुप्पी, आरोपी अब भी सिस्टम में सक्रिय

प्रयागराज। राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई), नैनी प्रयागराज में भ्रष्टाचार की परतें एक-एक कर उजागर हो रही हैं। आईटीआई राजकीय औद्योगिक संस्थान नैनी के कर्मचारी अजय कुमार के खिलाफ कई बार शिकायतें की गईं, लेकिन विभाग ने अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। यह दर्शाता है कि आईटीआई विभाग में भ्रष्टाचार को संरक्षण मिल रहा है।

प्रदेश भर में आईटीआई संस्थानों में 438 अवैध नियुक्तियों का मामला वर्षों से फाइलों में दबा पड़ा है। इन नियुक्त कर्मचारियों पर न केवल कोई कार्रवाई नहीं हुई, बल्कि उन्हें प्रमोशन देकर बेहतर पदों पर तैनात कर दिया गया है। यह न केवल नियमों की अवहेलना है, बल्कि सरकार की भ्रष्टाचार विरोधी नीति पर भी सवाल खड़े करता है।

नैनी आईटीआई से जुड़ा एक और मामला सामने आया है, जहां अनुदेशक राम नरेश यादव ने 26 महीने तक अवैध रूप से सेवा की, जिससे विभाग को लगभग 24 लाख रुपये का नुकसान हुआ। शासन के संज्ञान के बाद नैनी थाने में अपराध संख्या 158/23 के तहत एफआईआर दर्ज की गई, लेकिन प्रमुख दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई।

इस पूरे घोटाले में तत्कालीन प्रधानाचार्य सुजीत श्रीवास्तव, सत्यापन लिपिक राज सिंह और स्थापना लिपिक संजय कुशवाहा की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है, लेकिन अब तक इन अधिकारियों पर कोई जांच या दंडात्मक कार्रवाई नहीं हुई।

स्थानीय कर्मचारी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि विभागीय मिलीभगत और प्रशासनिक उदासीनता के चलते यह मामला राजस्व और नैतिकता दोनों का हनन बन चुका है।

जरूरत है निष्पक्ष जांच और दोषियों पर तत्काल कड़ी कार्रवाई की, ताकि जनता का विश्वास बहाल हो और विभाग की कार्यप्रणाली पारदर्शी बन सके।

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