बिहार की JDU, लोजपा यूपी में सीट मांग रहीं:NDA से समझौता नहीं हुआ तो अकेले चुनाव लड़ेंगी; किसे नुकसान होगा
2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में बिहार की 2 अहम पार्टियां भी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही हैं। ये पार्टियां जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) और लोक जनशक्ति पार्टी-रामविलास (लोजपा-आर) हैं। दोनों पार्टियों ने संगठन स्तर पर अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान जहां प्रयागराज में ‘यूथ बोले तो’ जैसे कार्यक्रमों के जरिए युवाओं को जोड़ रहे हैं। वहीं, बिहार के पूर्व सीएम नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार वाराणसी का 2 दिन का दौरा करके यूपी की सियासी नब्ज टटोल चुके हैं। 25 अक्टूबर को पार्टी का बड़ा जमावड़ा वाराणसी में होने जा रहा है। सवाल है, NDA की सहयोगी पार्टियां जदयू और लोजपा-आर यूपी में कितनी सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती हैं? क्या दोनों दलों का भाजपा के साथ गठबंधन संभव है? अगर दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं, तो इसका असर किस पार्टी पर पड़ेगा? पढ़िए पूरी रिपोर्ट… बिहार में भाजपा के 2 मजबूत सहयोगियों में जनता दल यूनाइटेड और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) की गिनती होती है। दोनों के पास बिहार विधानसभा में 85 और 19 विधायक हैं। वहीं, लोकसभा में दोनों दलों के 17 सांसद हैं। इनमें 12 जदयू और 5 लोजपा (रामविलास) के सांसद हैं। इससे बिहार के लिहाज से भाजपा के लिए दोनों दलों की अहमियत समझी जा सकती है। अब दोनों दल पार्टी के विस्तार के लिए यूपी विधानसभा चुनाव पर नजर लगाए हैं। जदयू बिहार में भाजपा को अपना मुख्यमंत्री बनाने के बदले यूपी में सीटें चाहती है। वहीं, चिराग पासवान भी अपनी पार्टी का विस्तार करना चाहते हैं। उसे अखिल भारतीय पहचान दिलाने की कोशिश में हैं। यूपी को लेकर जदयू का क्या है प्लान? जदयू ने यूपी विधानसभा चुनाव को देखते हुए बिहार सरकार में मंत्री श्रवण कुमार को प्रदेश प्रभारी बनाया है। पार्टी के यूपी प्रदेश अध्यक्ष अनूप सिंह पटेल का कहना है- प्रदेश प्रभारी की अगुआई में पार्टी 60 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। ये सीटें पूर्वांचल के साथ-साथ मध्य और पश्चिमी यूपी की भी हैं। यानी पार्टी सिर्फ बिहार से सटे पूर्वांचल पर ही अपना फोकस नहीं रखना चाहती। पार्टी के चुनाव लड़ने की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बिहार के पूर्व सीएम नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार खुद 2 दिन वाराणसी में रहे। उन्होंने बाबा विश्वनाथ के दरबार में पूजा-अर्चना की और गंगा आरती में भी शामिल हुए। फिर सर्किट हाउस में मीडिया से बातचीत में निशांत कुमार ने कहा- मेरा सौभाग्य है कि मैं वाराणसी की पावन धरती पर आया। गुरुवादी बाबा हमारे कुल के देवता हैं, इसलिए उनसे आशीर्वाद लिया। 25 अक्टूबर को जदयू ने वाराणसी में प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक बुलाई है। इसमें प्रदेश कार्यकारिणी का पुनर्गठन भी किया जाएगा। पार्टी इस बैठक में यूपी को लेकर अपना ब्लूप्रिंट पदाधिकारियों के सामने रखेगी। साथ ही, सीटों के बंटवारे और गठबंधन को लेकर भी अपना रुख साफ करेगी। जदयू के यूपी दावे में कितना दम? जदयू का फोकस पूर्वांचल के वाराणसी, मिर्जापुर, जौनपुर, गाजीपुर और देवरिया जैसे जिलों पर है। इन इलाकों में कुर्मी, पटेल और अन्य पिछड़ा वर्ग के वोटरों का अच्छा प्रभाव माना जाता है। बिहार में नीतीश कुमार का प्रमुख आधार कुर्मी और अति पिछड़ा वर्ग रहा है। ऐसे में जदयू को उम्मीद है कि भाजपा और अपना दल (एस) के साथ मिलकर चुनाव लड़ने से ओबीसी वोटों का बिखराव रोका जा सकता है। वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं- किसी भी गठबंधन की असली ताकत उसका जनाधार होता है। यूपी में जदयू का कितना जनाधार है, इसका अंदाजा पिछले 2 विधानसभा चुनावों के नतीजों से लगाया जा सकता है। 2017 और 2022 में जदयू ने अकेले चुनाव लड़ा था। 2022 में पार्टी ने 27 सीटों पर प्रत्याशी उतारे, लेकिन किसी भी सीट पर जमानत नहीं बचा सकी। पार्टी को कुल 0.05% वोट मिले थे। लोजपा भी यूपी चुनाव लड़ने का कर चुकी है ऐलान भाजपा की बिहार में दूसरे नंबर की प्रमुख सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) भी यूपी चुनाव में दम दिखाने का ऐलान कर चुकी है। 6 जुलाई को लोजपा (आर) ने राजधानी लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक की थी। इसमें चिराग पासवान खुद शामिल हुए थे। तब उन्होंने कहा था कि उनकी पार्टी 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ेगी। अब 27 सितंबर को प्रयागराज में ‘यूथ बोले तो’ कार्यक्रम के दौरान भी उन्होंने इसे दोहराया। प्रयागराज से लौटकर दिल्ली पहुंचने पर भी चिराग पासवान ने कहा- जिस तरीके से प्रयागराज में उत्तर प्रदेश के युवाओं का साथ देखने को मिला। यह मेरे उस विश्वास को बढ़ाता है, जिसके साथ यूपी विधानसभा चुनाव में मेरी पार्टी चुनाव लड़ने की सोच रखती है। कितनी सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में लोजपा लोजपा ने लखनऊ कार्यक्रम के दौरान यूपी की सभी 403 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी का दावा किया था। पार्टी की ओर से यूपी चुनाव प्रभारी बनाए गए अरुण भारती कहते हैं- पार्टी की तैयारी पूरी है। हमारे 2 बड़े आयोजन यूपी में हो चुके हैं। चिराग पासवान खुद दोनों आयोजनों में शामिल हुए। हम NDA का हिस्सा हैं। अगर भाजपा से सम्मानजनक सीटों की पेशकश मिलती है, तो लोजपा विचार करेगी। हमारा NDA से गठबंधन बिहार में है। बिहार से अलग दूसरे राज्यों के चुनाव में हर पार्टी को अधिकार है कि वह अपना जनाधार बढ़ाए। लोजपा भी यही कर रही है। हमारे समाज के बड़ी संख्या में वोटर यूपी में भी हैं। हम पासवान और दूसरे समाज को साथ लेकर आगे बढ़ेंगे। जदयू और लोजपा से क्या भाजपा यूपी में गठबंधन कर सकती है वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह इसका जवाब ‘न’ में देते हैं। वे कहते हैं- यूपी में पहले से ही NDA गठबंधन में 4 क्षेत्रीय दल शामिल हैं। चारों दलों में रालोद की जाट, अपना दल (एस) की कुर्मी-कुशवाहा, सुभासपा की राजभर और निषाद पार्टी की निषाद समाज में पैठ है। इस बार भाजपा के सामने अपने चारों सहयोगियों को सीट की गुत्थी सुलझानी है। ऐसे में वह 2 और दलों की गठबंधन में एंट्री कराकर अपनी मुसीबत नहीं बढ़ाएंगे। जदयू का बिहार में जो कोर वोट बेस है, वो कुर्मी-कुशवाहा में है। अपना दल (एस) यूपी में इसी कोर वोट बेस की राजनीति करती है। लोजपा का जरूर बिहार में कोर वोट बेस पासवान समाज में है। यूपी में ये समाज पहले से भाजपा के साथ रहा है। 2024 लोकसभा में जरूर इस समाज का झुकाव सपा की ओर हुआ था। लोजपा जरूर इसकी भरपाई कर सकती है। दोनों दल अलग हुए तो किसका नुकसान चुनाव में हर बार बड़ी संख्या में अलग-अलग जिलों और जातियों में प्रभाव रखने वाले छोटे दल किस्मत आजमाने उतरते रहते हैं। ये भले ही ज्यादा सीटें न जीतें, लेकिन हजार-दो हजार वोट भी कई सीटों का नतीजा बदल देते हैं। राजनीतिक विश्लेषक प्रो. संजय कुमार कहते हैं- कई बार बड़े दल भी अपने फायदे के लिए छोटे दलों का इस्तेमाल करते हैं। बड़ी पार्टियां विरोधी को हराने के लिए छोटे दलों से ऐसे प्रत्याशी उतारने के लिए कहती हैं, जो वोटर्स को बांट सकें। छोटी पार्टियां मुख्य उम्मीदवार के कीमती वोट काटकर जीत-हार का समीकरण बदल देती हैं। जदयू और लोजपा दोनों बिहार में भाजपा की सहयोगी हैं। यूपी में भी वे अपने कोर वोटर को साधकर ही आगे बढ़ना चाहेंगे। ऐसे में उनके अलग चुनाव लड़ने से अगर थोड़ा भी नुकसान हुआ, तो भाजपा को ही होगा। हालांकि, यूपी में हुए पिछले दो चुनाव परिणामों में दोनों दलों का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा था। कब यूपी में साथ रहे 2003 में जदयू में विलय से पहले समता पार्टी यूपी में NDA गठबंधन के साथ चुनाव लड़ती थी। 1996 में समता पार्टी को 2 सीटें मिली थीं। उसमें से वह एक जीतने में सफल रही थी। 1998 में समता पार्टी ने अपने हिस्से की दोनों सीटें जीत ली थीं। 2003 में समता पार्टी का जदयू में विलय हो गया था। हालांकि, समता पार्टी ने विधानसभा चुनाव कभी नहीं लड़ा। —————————— यह खबर भी पढ़ें- अपर्णा की लखनऊ की 3 सीटों से दावेदारी मजबूत, मुलायम की छोटी बहू ने क्यों कहा- मैनपुरी से नहीं लड़ूंगी मुलायम सिंह की बहू अपर्णा यादव अगला यूपी विधानसभा चुनाव लड़ सकती हैं। मैनपुरी के सैफई में उन्होंने कहा- तैयारी पूरी है, लेकिन मैनपुरी से चुनाव लड़ने की इच्छा नहीं है। मैं किस विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ूंगी, इसका फैसला भाजपा करेगी। पढ़िए पूरी खबर…
