मधुमिता के घर अब हमले और फायरिंग क्यों:बहन निधि बोलीं- मेरा ‘दुश्मन’ सिर्फ अमरमणि; मेरे पास सबूत, आधी सजा जेल से बाहर काटी
30 जून की रात मधुमिता शुक्ला की बहन निधि शुक्ला के घर के बाहर बम से हमला हुआ। लखीमपुर के उनके घर पर पुलिस पहुंची, तो डरी-सहमी निधि घर से बाहर आईं। उन्होंने कहा- मेरा इस दुनिया में कोई और दुश्मन नहीं है। सिर्फ अमरमणि और उसका परिवार है…। उसी ने हमला करवाया है। पिछले साल भी हमारे ऊपर फायरिंग हुई थी। निधि कहती हैं- मेरी बहन की हत्या हुई, मैं इन सबके खिलाफ लगातार केस लड़ी। इन सबको कोर्ट से सजा दिलवाई। बाद में इनकी सजा माफ हो गई। हम उसके बाद भी कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। हमारे घर पर बम फेंका गया, लेकिन पुलिस ने FIR तक नहीं लिखी, जांच ही कर रहे हैं। संडे बिग स्टोरी में पढ़िए मधुमिता की हत्या के बाद चली आ रही अदावत… मधुमिता के इंसाफ की लड़ाई जुड़वां बहन लड़ रहीं यूपी की राजनीति में मधुमिता शुक्ला हत्याकांड सबसे चर्चित मामलों में से एक रहा है। 2003 में 24 साल की उम्र में लखनऊ में मधुमिता की हत्या हो गई थी। इस हत्याकांड में उस वक्त यूपी सरकार में मंत्री रहे अमरमणि त्रिपाठी का नाम आया। बसपा सरकार में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। मधुमिता की जुड़वां बहन निधि शुक्ला ने बहन की हत्या की लड़ाई को कोर्ट में मजबूती से लड़ा। अमरमणि, उनकी पत्नी मधुमणि, अमरमणि के रिश्तेदार रोहित चतुर्वेदी, संतोष राय और प्रकाश पांडेय को उम्रकैद की सजा हुई। 2023 में यूपी की राज्यपाल की सिफारिश के बाद अमरमणि और मधुमणि की सजा माफ हो गई। निधि शुक्ला को कोर्ट के आदेश पर सरकार की तरफ से सुरक्षा मिली है। वह लखीमपुर खीरी जिले के मिश्राना मोहल्ले में रहती हैं। 30 जून को हुए हमले को लेकर दैनिक भास्कर ने पूछा कि यह हमला डराने के लिए था या फिर कुछ और साजिश थी? निधि कहती हैं- यह तो हमला करने वाले और हमला करवाने वाले ही बता पाएंगे। रात 3 बजे अचानक हमला हुआ। सुरक्षा में पुलिसकर्मी तैनात थे। उन्होंने तुरंत हमें फोन किया। कहा कि बाहर आ जाइए, हमला हो गया है। हमने बाहर आने से मना कर दिया, क्योंकि हमें पता है कि हमला करने वाले कुछ और भी कर सकते हैं। इसके बाद उसने डॉयल 112 पर फोन किया, तुरंत ही पुलिस की गाड़ी आ गई। इसके बाद मैं बाहर आई। उन्होंने सब कुछ देखा। कागज पर तो हमें 3 सुरक्षाकर्मी मिले हैं, लेकिन पिछले डेढ़ सालों से 1 ही सुरक्षाकर्मी यहां रहते हैं। एक 12 घंटे रहते हैं, फिर दूसरे अगले 12 घंटे के लिए आ जाते हैं। पुलिस प्रशासन से जब पूछिए तो वह कहते हैं कि हमारे पास सुरक्षाकर्मियों की कमी है। ‘ये लोग मानसिक क्रिमिनल हैं, इन्हें मेरी जिंदगी अखर रही’ निधि को इस केस में शुरुआत से धमकियां मिलती रही थीं। इसलिए उन्होंने कोर्ट में इस केस को दूसरे राज्य में ट्रांसफर करवाने की मांग की थी। तब देहरादून कोर्ट में यह केस ट्रांसफर कर दिया गया था। गवाहों को डराने-धमकाने के कई बार मामले सामने आए। निधि गवाहों के साथ मजबूती के साथ डटी रहीं। यही कारण है कि 2007 में देहरादून की स्पेशल कोर्ट ने पूर्व मंत्री अमरमणि, उनकी पत्नी मधुमणि, रोहित, संतोष राय को उम्रकैद की सजा सुना दी। प्रकाश राय को बरी कर दिया। हालांकि, बाद में हाईकोर्ट ने प्रकाश को भी उम्रकैद की सजा सुनाई थी। निधि कहती हैं- अमरमणि और उसके लोग मानसिक क्रिमिनल हैं। इन्हें मेरी जिंदगी अखर रही है। यही कारण है कि बार-बार हमले करवा रहे हैं। हम सरकार और पुलिस को बराबर सूचनाएं दे रहे हैं। लेकिन, कोई काम नहीं हो रहा है। इन्हें लगता है कि हम इनसे लड़ाई में पीछे हट जाएंगे, तो ऐसा संभव नहीं है। अपनी बहन के लिए हम लगातार कानूनी लड़ाई लड़ेंगे। पिछली बार इन लोगों ने मेरे ऊपर फायरिंग करवाई थी। उसके पहले भी हमारे घर के बाहर बम फेंके गए थे। जब से अमरमणि जेल से छूटा है, तब से अब तक करीब 10 बार हमला हो चुका है। ‘अमरमणि सजा के दौरान 62% जेल से बाहर रहे’ निधि बताती हैं- 2007 में जब पहली बार कोर्ट ने सजा सुना दी थी। तब भी कोई न कोई तरकीब निकालकर अमरमणि जेल से बाहर आ जाता था। 2012 में जब समाजवादी पार्टी की सरकार बन गई, तब वह कहता था कि अब तो जेल जाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। हमारे पास तो सारे कागज हैं। इस व्यक्ति ने 62% सजा जेल के बाहर रहकर काटी है। मैंने तो राज्यपाल आनंदी पटेल मैडम को भी सारे कागज दिए थे, पता नहीं क्यों इसे छोड़ दिया गया? उम्रकैद की सजा के बाद अमरमणि की विधायकी चली गई थी 2007 में यूपी में विधानसभा चुनाव हुए। अमरमणि को बसपा ने पार्टी से निष्कासित कर दिया था। लेकिन, सपा ने उन्हें महराजगंज की नौतनवा सीट से प्रत्याशी बना दिया। अमरमणि जेल में रहते हुए चुनाव जीत गए। लेकिन, इसके कुछ ही महीनों बाद, 24 अक्टूबर 2007 को देहरादून की स्पेशल कोर्ट ने उसे उम्रकैद की सजा सुना दी और इसके साथ ही उनकी विधायकी भी चली गई। 2003 का वह खौफनाक मंजर: कोर्ट में ऐसे साबित हुए थे आरोप लखनऊ की पेपर मिल कॉलोनी में कवयित्री मधुमिता शुक्ला रहती थीं। वह वीर रस की कविताएं पढ़ती थीं। साल- 2000 के आसपास वह बेहद लोकप्रिय थीं। 9 मई, 2003 को उनके घर दो लोग (संतोष राय और प्रकाश चंद्र पांडेय) पहुंचे। उन्होंने कविताओं से जुड़ा कोई प्रोग्राम करवाने की बात की। मधुमिता ने अपने घरेलू नौकर देशराज को अंदर चाय बनाने के लिए भेज दिया। नौकर के अंदर जाते ही दोनों शूटरों ने मधुमिता पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी। गोली सीने में लगी और मौके पर ही मधुमिता की जान चली गई। पोस्टमॉर्टम और डीएनए (DNA) रिपोर्ट में सामने आया कि मधुमिता 7 महीने की गर्भवती (प्रेग्नेंट) थीं। वह बच्चा अमरमणि का था। जांच में साफ हुआ कि इन शूटरों का इंतजाम अमरमणि के रिश्तेदार रोहित चतुर्वेदी ने किया था। कोर्ट में निधि शुक्ला ने इन सभी तथ्यों को बेहद मजबूती से साबित किया था। इस सजा के खिलाफ अमरमणि ने उत्तराखंड हाईकोर्ट का रुख किया। लेकिन, जुलाई 2012 में हाईकोर्ट ने भी सीबीआई कोर्ट की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा। अमरमणि ने ‘बीमार’ बनकर सजा के 10 साल हॉस्पिटल में बिताए अमरमणि शुरुआत में हरिद्वार की रौशनाबाद जेल में बंद रहा, जहां उसकी पत्नी मधुमणि भी थी। बाद में 2012 तक दोनों को गोरखपुर जेल ट्रांसफर कर दिया गया। लेकिन जेल आने के ठीक एक साल बाद, 13 फरवरी 2013 को अमरमणि इलाज के बहाने गोरखपुर के बाबा राघव दास (BRD) मेडिकल कॉलेज पहुंचा। फिर अगले 10 साल के लिए वहीं का होकर रह गया। हॉस्पिटल के मनोचिकित्सा विभाग के कमरा नंबर- 16 को पति-पत्नी ने अपना पक्का ठिकाना बना लिया। बाहर पुलिस का पहरा रहता था। अमरमणि यहां मानसिक अस्वस्थता, स्पाइनल और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का हवाला देकर टिका रहा। साल- 2022 में जब बीआरडी कॉलेज के तत्कालीन प्रिंसिपल डॉ. गणेश कुमार से मीडिया ने पूछा कि अमरमणि को आखिर बीमारी क्या है? तो उन्होंने कहा था- वे मानसिक बीमारी बताकर रुके हैं, बाकी बीमारी उन्हीं से पूछ लीजिएगा। अस्पताल से ही चलाई बेटे की सियासत अमरमणि अस्पताल में भले ही वीआईपी कैदी बनकर जमा रहा। लेकिन, वहां से करीब 80 किलोमीटर दूर अपनी पुश्तैनी सीट नौतनवा पर वे पूरी तरह सक्रिय था। उसने अस्पताल से ही अपने बेटे अमनमणि त्रिपाठी की सियासत को मजबूत किया। 2017 में उसे निर्दलीय विधायक बनवाया। अमनमणि पर भी अपनी पत्नी सारा सिंह की हत्या का आरोप है। हद तो तब हो गई जब 17 फरवरी, 2019 को अमरमणि की बेटी की दिल्ली में सगाई थी और कोर्ट से पैरोल नहीं मिली। ठीक एक दिन पहले 16 फरवरी को अमरमणि की तबीयत अचानक खराब दिखाई गई। उसे तुरंत दिल्ली एम्स रेफर करवा दिया गया। निधि शुक्ला का दावा है कि अमरमणि ने अपनी 62% सजा जेल के बजाय अस्पतालों में काटी। रिमिशन पॉलिसी के तहत 2023 में रिहाई इस पूरी कहानी में सबसे बड़ा मोड़ 25 अगस्त, 2023 को आया, जब उत्तर प्रदेश सरकार की 2018 की रिमिशन पॉलिसी (समय पूर्व रिहाई नीति) के तहत अमरमणि और उनकी पत्नी मधुमणि को रिहा कर दिया गया। इसके पीछे उनकी उम्र (66) और जेल में अच्छे व्यवहार को आधार बनाया गया। दस्तावेजों के हिसाब से अमरमणि ने 20 साल की सजा पूरी की। इस केस से जुड़े अन्य किरदारों की बात करें, तो मधुमिता को गोली मारने वाले शूटर प्रकाश पांडेय की 14 सितंबर, 2024 को कैंसर से मौत हो चुकी है। साजिश रचने वाले रोहित चतुर्वेदी को 22 साल जेल में रहने के बाद पिछले ही महीने रिहा किया गया है। अब इस पूरे मामले में सिर्फ मुख्य शूटर संतोष राय ही जेल में बंद है। अमरमणि की इस रिहाई के खिलाफ निधि शुक्ला ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया था। लेकिन, अदालत ने रिहाई पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि, तमाम हमलों और खतरों के बावजूद निधि आज भी अपनी कानूनी लड़ाई में पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। —————————- यह खबर भी पढ़ें – यूपी में मधुमिता शुक्ला के घर पर बम से हमला, बहन बोलीं- बाहुबली अमरमणि मेरा दुश्मन, अनहोनी हुई तो इनका परिवार जिम्मेदार होगा यूपी के लखीमपुर में कवयित्री मधुमिता शुक्ला की बहन के घर पर बुधवार तड़के 3 बजे बम से हमला किया गया। मधुमिता की बहन निधि शुक्ला ने जब FIR के लिए शिकायत दी, तब मामला सामने आया। उन्होंने सदर कोतवाली में एक व्यक्ति को नामजद करते हुए शिकायत दी है। पुलिस से एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। पढ़िए पूरी खबर…
