दावा- सोने-चांदी की 1250 श्रीराम शिलाएं गायब:सबसे महंगी शिला मॉरीशस से आई थी; मुंबई के व्यापारी ने हीरे जड़ी शिला दान दी थी
अयोध्या के श्रीराम मंदिर में चढ़ावे की चोरी कोई नई नहीं है। धर्मसेना के संस्थापक संतोष दुबे का दावा है कि 1989 में गांव-गांव, शहर-शहर और देश-विदेश से पूजित होकर अयोध्या आईं सोने-चांदी, हीरे-माणिक्य और अष्टधातु की 1250 शिलाएं अब ‘गायब’ हो चुकी हैं। ये शिलाएं 2002 तक कारसेवकपुरम में रहीं। मिट्टी की पूजित शिलाएं आज भी कारसेवकपुरम में रखी हैं, लेकिन धातु की शिलाएं कहीं दिखाई नहीं देतीं। संतोष दुबे के मुताबिक, सोने-चांदी की शिलाओं की देख-रेख का जिम्मा भी ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के पास था। ये शिलाएं कारसेवकपुरम में जहां सुरक्षित रखी गई थीं, वहां 3 ताले लगे थे। फिर ये शिलाएं कहां गायब हो गईं, यह किसी को नहीं पता है। सवा रुपया दे दे रे भैया रामशिला के नाम का… श्रीराम मंदिर आंदोलन से जुड़े संतोष दुबे ने दैनिक भास्कर से कहा, ‘श्रीराम मंदिर के लिए 1985 में ‘श्रीराम जन्मभूमि न्यास’ बना। इसके अध्यक्ष परमहंस रामचंद्र दास थे। न्यास में विहिप के अशोक सिंघल, गिरिराज, रामविलास वेदांती, चंपत राय समेत कई लोग थे। श्रीराम मंदिर आंदोलन को धार देने के लिए 1989 में विहिप ने पहला बड़ा अभियान शुरू किया। नारा दिया गया- ‘सवा रुपया दे दे रे भैया रामशिला के नाम का, राम के घर में लग जाएगा पत्थर तेरे नाम का।’ इस अभियान में विहिप ने हर एक व्यक्ति से सवा रुपए, मतलब एक घर से 5 से 10 रुपए चंदा देने के लिए कहा। साथ ही घर-घर से पूजित शिलाएं भी मांगीं। विहिप ने कहा था कि श्रीराम मंदिर के निर्माण में इन शिलाओं का इस्तेमाल किया जाएगा। इस अभियान ने पूरे देश में श्रीराम मंदिर के आंदोलन को तेज कर दिया। लोगों ने खुलकर दान दिया।’ वह आगे कहते हैं, ‘मैं तो अयोध्या में ही रहता हूं। तब कारसेवकपुरम से जुड़ गया था। मेरा काम ऐसी शिलाओं का लेखा-जोखा तैयार करने का था, जो सोने-चांदी, हीरा, माणिक्य, अष्टधातु सहित अन्य महंगी धातुओं से तैयार करके भेजी जा रही थीं। तब मेरी उम्र 22-23 साल की रही होगी। मेरे साथ इस गणना में तब संघ के एक प्रचारक डॉ. रामविलास वेदांती और परमहंस रामचंद्र दास शामिल थे। डॉ. रामविलास वेदांती और परमहंस रामचंद्र दास आज इस दुनिया में नहीं हैं।’ सबसे महंगी शिला मॉरीशस से आई, मुंबई के व्यापारी ने हीरे जड़ी शिला दी थी संतोष दुबे दावा करते हैं, ’सोने-चांदी और अष्टधातु की इन शिलाओं की कुल संख्या 1250 थी। परमहंस रामचंद्र दास जी बताते थे कि इन शिलाओं में सबसे महंगी शिला मॉरीशस वाली थी। मुंबई के एक व्यापारी ने जो शिला भेजी थी, उस पर हीरे जड़े थे। सबसे ज्यादा चांदी, फिर सोने की शिलाएं थीं।’ 3 तालों के अंदर से 2002 के बाद ‘गायब’ हो गईं शिलाएं ये शिलाएं ट्रस्ट के अध्यक्ष परमहंस रामचंद्र दास के निर्देश पर विहिप के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय की देख-रेख में रखवाई गई थीं। शिलाएं सुरक्षा के लिए जहां रखी गईं, वहां 3 ताले लगाए गए थे। 2002 तक ये शिलाएं थीं। इसके बाद से पता नहीं चला। संतोष दुबे कहते हैं, ’इसके पीछे चंपत राय की भूमिका रही है। दावा करते हैं कि परमहंस रामचंद्र दास इसी सदमे में बीमार रहने लगे और 2 साल बाद प्राण त्याग दिए। डॉ. रामविलास वेदांती डर की वजह से बोल नहीं पाए। इससे साफ है कि श्रीराम मंदिर के नाम पर मिलने वाले दान के सोने-चांदी की चोरी आज नहीं, 1989 से ही शुरू हो गई थी।’ श्रीराम मंदिर मॉडल की दानपेटी के चढ़ावे का भी कोई रिकॉर्ड नहीं संतोष दुबे कहते हैं, ‘कारसेवकपुरम में विहिप ने श्रीराम मंदिर का मॉडल रखा था। इसके सामने एक दानपेटी रखी गई थी। इसमें भी देशभर से आने वाले श्रद्धालु दान करते थे। इस दानपेटी में 50 रुपए से अधिक दान देने वालों की रसीद काटी जाती थी। मतलब, इससे कम की राशि का कोई लेखा-जोखा नहीं था। इस दानपेटी में हर महीने पांच से 7 लाख रुपए जमा होते थे। दान देने वाले व्यक्ति को बदले में श्रीराम मंदिर मॉडल की एक फोटो दी जाती थी। तब भी विहिप की तरफ से चंदे में मिलने वाली राशि कभी सार्वजनिक नहीं की गई।’ ट्रस्ट गठन के समय न्यास के खाते में सिर्फ 8.50 करोड़ ही दिखाए गए संतोष दुबे कहते हैं, ‘5 फरवरी, 2020 को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट बना। तब न्यास को इसमें समाहित कर दिया गया। उस समय न्यास के खाते में सिर्फ 8.50 करोड़ रुपए दिखाए गए थे। तब भी सोने-चांदी की शिलाओं का कोई उल्लेख नहीं किया गया। इसके बाद ट्रस्ट ने समर्पण और सहयोग राशि अभियान चलाया। ऑनलाइन भी चंदा लिया गया। घर-घर चलाए गए समर्पण राशि के लिए रसीद भी दी गई। हालांकि, रसीद और दान में मिली राशि को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। पहले न्यास और अब ट्रस्ट में चंपत राय ही सर्वेसर्वा की भूमिका में हैं। आरोप लगते हैं कि कभी भी उनकी तरफ से पारदर्शिता दिखाने की कोशिश नहीं की गई।’ साढ़े चार साल में 61 करोड़ दर्शन को पहुंचे श्रीराम मंदिर में दर्शन करने 2022 से अब तक साढ़े चार साल में 61.53 करोड़ लोग पहुंचे। सूत्रों के मुताबिक, दर्शन करने जाने वाला सामान्य व्यक्ति भी कम से कम 10 रुपए श्रद्धा भाव से जरूर चढ़ाता है। इस हिसाब से 600 करोड़ रुपए सिर्फ दान पेटियों में लोगों ने दान किया। इसमें महिलाओं की ओर से दान की गई सोने-चांदी के जेवरों की बात नहीं की जा रही है। 2024 में चंपत राय ने जब चढ़ावे का विवरण दिया था, तब उन्होंने 13 क्विंटल चांदी और 20 किलो सोने का जिक्र किया था। 2025 में करीब 30 करोड़ लोगों ने दर्शन किए। इस हिसाब से 2025 में करीब 300 करोड़ का चढ़ावा आना चाहिए। जबकि 1 अप्रैल, 2025 से 28 फरवरी, 2026 का जो रिकॉर्ड ट्रस्ट ने 21 मार्च की बैठक में पेश किया था, उसमें सिर्फ 54 करोड़ रुपए दिखाए गए थे। अब अगर 2026 की बात करें, तो जनवरी से 15 जून तक लगभग 7 करोड़ लोग दर्शन कर चुके हैं। भास्कर टीम को देखते ही बाहर निकाला संतोष दुबे के आरोपों पर चंपत राय का पक्ष जानने भास्कर टीम राम मंदिर ट्रस्ट कार्यालय पहुंची। यहां एक कमरे में तोड़-फोड़ चल रही थी। अंदर ईंटों के टुकड़ों की सफाई की जा रही थी। उसी कमरे में एक कुर्सी पर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय बैठे थे। टीम ने ट्रस्ट कर्मचारियों को अपनी पहचान बताई और कहा कि चंपत राय से बात करनी है। इसके बाद ट्रस्ट कर्मचारियों ने टीम को ज्यादा देर रुकने नहीं दिया। —————————- ये खबरें भी पढ़िए- ऑटो ड्राइवर ने राम मंदिर मैनेजमेंट में कैसे ली एंट्री, टिन्नू यादव पर चढ़ावे की चोरी के आरोप; 28 साल पहले चंपत राय से जुड़ा था अयोध्या के श्रीराम मंदिर में चढ़ावे की चोरी के बाद देशभर में टिन्नू यादव सुर्खियों में है। कहने को टिन्नू ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के खास सहयोगी है, लेकिन श्रीराम मंदिर ट्रस्ट में वह बहुत पावरफुल बताया जाता है। चाहे सिक्योरिटी का मैनेजमेंट हो या चढ़ावे को बैंक में डिपॉजिट कराना हो, टिन्नू ही सब कुछ मैनेज करता आया है। पढ़िए पूरी खबर…
