देश की न्याय व्यवस्था पर बढ़ते सवाल: 5.4 करोड़ से अधिक लंबित मुकदमों ने बढ़ाई चिंता
नई दिल्ली। देश की न्याय व्यवस्था एक बार फिर गंभीर बहस का विषय बनी हुई है। अदालतों में लंबित मामलों की लगातार बढ़ती संख्या, न्याय मिलने में हो रही देरी और न्यायिक प्रक्रिया की जटिलताओं को लेकर आम नागरिकों, कानून विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों के बीच चिंता बढ़ रही है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार 31 दिसंबर 2025 तक देश की विभिन्न अदालतों में 5.39 करोड़ से अधिक मामले लंबित थे। इनमें सुप्रीम कोर्ट में लगभग 92 हजार, हाई कोर्टों में 63.66 लाख तथा जिला एवं अधीनस्थ अदालतों में 4.76 करोड़ से अधिक मुकदमे शामिल हैं।
वकीलों की फीस और न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता पर उठ रहे सवाल
आम लोगों का कहना है कि वकीलों की फीस के लिए कोई निश्चित मानक नहीं होने के कारण मुकदमेबाजी लगातार महंगी होती जा रही है। कई मामलों में फीस और अन्य खर्चों की रसीद नहीं मिलने की शिकायतें भी सामने आती हैं। पारिवारिक, संपत्ति और दीवानी विवादों में वर्षों तक मुकदमे चलने से दोनों पक्ष आर्थिक और मानसिक रूप से प्रभावित होते हैं।
कई नागरिकों का मानना है कि यदि न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़े, फीस व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बनाया जाए और डिजिटल तकनीकों का व्यापक उपयोग हो तो आम लोगों का न्याय व्यवस्था पर विश्वास और मजबूत हो सकता है।
लंबित मुकदमों का बढ़ता बोझ, न्यायिक सुधार की बढ़ी मांग
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार न्यायाधीशों की कमी, बार-बार स्थगन, जटिल कानूनी प्रक्रियाएं और बढ़ते मुकदमों का दबाव न्याय में देरी के प्रमुख कारण हैं। कई मामलों में पीढ़ियां गुजर जाती हैं, लेकिन अंतिम फैसला नहीं आ पाता। इससे न केवल न्याय प्रणाली पर बोझ बढ़ता है बल्कि आम नागरिकों का भरोसा भी प्रभावित होता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने, अदालतों में आधुनिक तकनीक के उपयोग को बढ़ावा देने, ई-कोर्ट प्रणाली को मजबूत करने तथा वैकल्पिक विवाद निस्तारण (ADR) व्यवस्था को प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।
त्वरित न्याय के लिए ठोस कदमों की जरूरत
कानूनी जानकारों का मानना है कि व्यापक न्यायिक सुधारों के बिना लंबित मुकदमों का बोझ कम करना और आम नागरिकों को समयबद्ध न्याय उपलब्ध कराना कठिन होगा। न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और तकनीकी नवाचारों को बढ़ावा देकर ही देश की अदालतों पर बढ़ते दबाव को कम किया जा सकता है।
देश में न्यायिक सुधारों को लेकर लगातार चर्चा हो रही है और आम नागरिकों की अपेक्षा है कि सरकार, न्यायपालिका और संबंधित संस्थाएं मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित करें, जिससे लोगों को सुलभ, पारदर्शी और त्वरित न्याय मिल सके।
रिपोर्ट: अमरनाथ झा
