स्टेटस-को के बीच बिकती रही विवादित जमीन, नामांतरण निरस्त फिर भी मिला कब्जा, मंझनपुर तहसील के भैला मकदूमपुर गांव का मामला
👉 स्टेटस-को के बीच विवादित जमीन की होती रही खरीद-फरोख्त ,2007 में हाईकोर्ट ने दिया था यथास्थिति बनाए रखने का आदेश..
👉 आराजी संख्या 418 और 419 को लेकर तीन दशक से चल रहा विवाद , 2012 में कब्जे के प्रयास को एडीएम ने था रुकवाया …
👉 मंजू शाहू को भी नहीं मिला कब्जा, 2020 में राम सुरेश ने खरीदी जमीन ,2021 में राम सुरेश का नामांतरण हुआ, बाद में निरस्त हो गया…
👉 सिविल और राजस्व अदालतों में मुकदमे लंबित होने का दावा…
👉 हाईकोर्ट के आदेश में ‘कानूनी अड़चन न हो’ की शर्त पर हदबंदी…
👉 लंबित मुकदमों के बीच प्रशासनिक स्तर पर कब्जा दिलाने पर सवाल , विमला देवी पक्ष ने पूरे मामले की जांच और न्याय की मांग की…
👉 हाईकोर्ट में लंबित था जमीन का विवाद, 2012 से 2021 के बीच हुई खरीद-फरोख्त पर उठे सवाल
👉 सिविल और राजस्व अदालतों में भी चलरहे थे मुकदमे , राम सुरेश के नाम हुआ नामांतरण बाद में निरस्त
👉 पत्थरगड़ी के आदेश में थी ‘कानूनी अड़चन न होने’ की शर्त ,विमला पक्ष ने प्रशासनिक कार्रवाई पर उठाए सवाल
कौशाम्बी। जिले के मंझनपुर तहसील के भैला मकदूमपुर गांव में आराजी संख्या 418 और 419 समेत विवादित जमीन को लेकर वर्षों से चला आ रहा विवाद अब प्रशासनिक कार्रवाई और न्यायिक प्रक्रिया के बीच उलझ गया है। पुराने चकबंदी अभिलेखों में दर्ज नामों से शुरू हुआ विवाद हाईकोर्ट के स्टेटस-को आदेश, वरासत, जमीन की खरीद-फरोख्त, नामांतरण निरस्तीकरण और बाद में एक पक्ष को कब्जा दिलाने तक पहुंच गया। विमला देवी पक्ष का आरोप है कि उसकी पुस्तैनी जमीन पर परिवार की नियत खराब हो गई और जब जमीन के संबंध में अलग-अलग अदालतों में मुकदमे चल रहे थे और नामांतरण भी निरस्त हो चुका था, तब भी प्रशासनिक स्तर पर राम सुरेश को कब्जा दिला दिया गया है ।
1983-84 के चकबंदी रिकॉर्ड में देवमन पुत्र माताबदल का पुराने रिकार्ड में नाम दर्ज है। विमला देवी पत्नी स्व0 रामबहोरी पक्ष के अनुसार पुराने चकबंदी अभिलेखों में देवमन तथा देवमन पुत्र माताबदल के नाम दर्ज हैं। अभिलेखों में 22 सितंबर 1983 और 9 जनवरी 1984 को चकबंदी अधिकारी के हस्ताक्षर होने की बात भी सामने आई है। इसके बाद रामबहोरि के पिता की मृत्यु हो गई । पक्ष का दावा है कि वरासत दर्ज करने का आदेश होने के बावजूद संबंधित लेखपाल ने समय से नाम दर्ज नहीं किया। बाद की राजस्व प्रविष्टियों और नामांतरण को लेकर ही विवाद खड़ा हुआ।

2007 में हाईकोर्ट ने दिया था स्टेटस-को…..
जमीन के विवाद को लेकर हरि प्रसाद व अन्य ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में सिविल एमडब्ल्यूपी संख्या 51284/2007 दाखिल की थी। 12 अक्तूबर 2007 के आदेश में हाईकोर्ट ने अगली तारीख तक पक्षकारों को यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया था। विवादित आराजियों में 418 और 419 भी शामिल होने का दावा किया जा रहा है।
विमला देवी पक्ष का कहना है कि यह अंतरिम संरक्षण बाद की कार्यवाहियों में भी प्रभावी रहा और इसी दौरान कई साल बाद विवादित जमीन की खरीद-फरोख्त होती रही। हालांकि किसी बिक्री विलेख की वैधता तय करने के लिए उस समय प्रभावी हाईकोर्ट आदेशों की पूरी श्रृंखला और बिक्री की तारीखों का परीक्षण जरूरी है।
पहले रामजी ने बेची, खरीदार को नहीं मिला कब्जा…
बताया गया है कि विवादित जमीन रामजी की ओर से अच्छे मियां निवासी समदा के नाम बेची गई। खरीदार को जमीन पर कब्जा नहीं मिल सका। 5 दिसंबर 2012 को कब्जे के प्रयास के दौरान रामबहोरि की ओर से एडीएम कौशांबी के समक्ष पत्र देकर कार्रवाई रुकवाने की बात कही गई है।
इसके बाद जमीन मंजू देवी निवासी सैता के नाम बेच दी गई। मंजू देवी को भी कब्जा नहीं मिला और उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया। लंबे समय तक विवाद चलने के बाद वर्ष 2020 में मंजू देवी ने जमीन राम सुरेश पुत्र बच्चा लाल, निवासी भैला मकदूमपुर, के नाम रजिस्ट्री कर दी।
2021 में नामांतरण, बाद में निरस्त…..
राम सुरेश की रजिस्ट्री के बाद 23 सितंबर 2021 को नामांतरण होने की बात सामने आई। विमला पक्ष के अनुसार यह नामांतरण बाद में निरस्त कर दिया गया और इसकी पुनर्स्थापना वाद को लेकर कार्यवाही चलती रही।
इसी दौरान नायब तहसीलदार न्यायालय में वाद संख्या 1982/2021 / 5957/2023, राम सुरेश बनाम मंजू शाहू लंबित था। इसमें 25 अक्तूबर 2023 की तारीख लगी थी। दूसरी ओर सिविल जज कनिष्ठ श्रेणी, कौशाम्बी के न्यायालय में वाद संख्या 600/2021, विमला देवी बनाम मंजू देवी भी चल रहा था।
कब्जा नहीं मिला तो हाईकोर्ट पहुंचे राम सुरेश…
2020 की रजिस्ट्री के बाद भी कब्जा नहीं मिलने पर राम सुरेश की ओर से हाईकोर्ट में हदबंदी/पत्थरगड़ी कराने की मांग किए जाने और आदेश प्राप्त करने की बात सामने आई है। हालांकि इस आदेश में “यदि कोई कानूनी अड़चन न हो” जैसी शर्त होने का दावा है।
यही शर्त अब विवाद का अहम हिस्सा बन गई है। विमला देवी पक्ष का कहना है कि उस समय जमीन से जुड़े कई मुकदमे अदालतों में लंबित थे। ऐसे में सवाल है कि पत्थरगड़ी या कब्जे की कार्रवाई से पहले संबंधित मुकदमों और प्रभावी न्यायिक आदेशों की स्थिति का सत्यापन किया गया था या नहीं।
मुकदमे लंबित थे, फिर भी कब्जे की कार्रवाई का आरोप..
विमला देवी पक्ष का आरोप है कि सिविल वाद, राजस्व वाद और नामांतरण संबंधी कार्यवाही लंबित होने के बावजूद एसडीएम आकाश सिंह स्तर से राम सुरेश को विवादित जमीन पर कब्जा दिलाया गया। पक्ष का यह भी आरोप है कि विमला देवी के पुत्र रवि सोनी को थाना करारी में फोन करके एसडीएम ने बुलवाया और उसे थाने में बैठवा कर मौके पर जाकर एसडीएम ने कब्जा दिला दिया और बाद में सीआरपीसी की धारा 151,107,116 के तहत चालान कर एसडीएम के समक्ष जब रवि को पेश किया गया, जहां से उसे एसडीएम ने जेल भेज दिया। उसकी जमानत जब हुई तो 25/09/2023 को टेवा जेल से शाम को रिहा किया गया है।
इन आरोपों की पुष्टि के लिए पुलिस की जीडी, 151 की रिपोर्ट, एसडीएम की पत्रावली और कब्जा दिलाने के मूल आदेश का परीक्षण आवश्यक है।
क्या स्टेटस-को के दौरान हुई रजिस्ट्री स्वत: अवैध है?
कानूनी तौर पर यह सवाल महत्वपूर्ण है। किसी प्रभावी स्टेटस-को या निषेधाज्ञा के दौरान की गई बिक्री आदेश के उल्लंघन का प्रश्न पैदा कर सकती है। वहीं, मुकदमे के लंबित रहने के दौरान संपत्ति के हस्तांतरण पर लिस पेंडेंस का सिद्धांत लागू हो सकता है। इसका सामान्य अर्थ यह है कि बाद का खरीदार लंबित मुकदमे के अंतिम परिणाम से बंधा रहता है।
हालांकि केवल इस आधार पर प्रत्येक रजिस्ट्री को स्वत: शून्य मानना सही नहीं होगा। यह देखना होगा कि बिक्री के समय कौन-सा आदेश प्रभावी था, उसमें बिक्री/हस्तांतरण पर क्या रोक थी और संबंधित बिक्री किस मुकदमे के दायरे में आती थी।
हाईकोर्ट के सामने तथ्य छिपाए गए या नहीं, जांच का विषय….
विमला पक्ष अब यह सवाल भी उठा रहा है कि यदि राम सुरेश ने पत्थरगड़ी का आदेश लेते समय लंबित सिविल और राजस्व मुकदमों, नामांतरण निरस्तीकरण तथा जमीन के पुराने विवाद की पूरी जानकारी हाईकोर्ट के सामने नहीं रखी, तो क्या न्यायालय को पूर्ण तथ्य बताए गए थे?
इसका जवाब हाईकोर्ट में दाखिल मूल याचिका, शपथपत्र और संलग्न दस्तावेज देखने के बाद ही दिया जा सकता है। यदि कोई महत्वपूर्ण तथ्य रिकॉर्ड से छिपाया गया हो तो उसकी कानूनी स्थिति का निर्धारण भी हाईकोर्ट ही करेगा।
21 अक्टूबर 2021 को हाईकोर्ट ने दिया था आदेश:.. मामले में राम सुरेश ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में WRIT-C संख्या 26369/2021 दाखिल की थी। न्यायमूर्ति आलोक माथुर की अदालत ने 21 अक्टूबर 2021 को याचिका का निस्तारण करते हुए एसडीएम मंझनपुर को निर्देश दिया था कि वह उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 24 के तहत राम सुरेश के 9 जुलाई 2021 के आवेदन का कानून के अनुसार, “यदि कोई कानूनी अड़चन न हो”, तो आदेश की प्रति प्रस्तुत होने की तारीख से तीन महीने के भीतर निस्तारण करें। अदालत ने मामले के गुण-दोष पर कोई फैसला नहीं दिया था। आदेश में राम सुरेश को सीधे विवादित जमीन का कब्जा दिलाने का निर्देश भी नहीं था। ऐसे में हाईकोर्ट के आदेश के बाद एसडीएम स्तर से कराई गई कब्जे की कार्रवाई में उस समय मौजूद अन्य मुकदमों, राजस्व मामलों और कथित कानूनी अड़चनों पर कितना विचार किया गया, यह जांच का महत्वपूर्ण बिंदु है।
अब न्यायिक फैसले पर टिका है जमीन का भविष्य…
फिलहाल विवादित जमीन पर अंतिम स्वामित्व और कब्जे का प्रश्न न्यायिक प्रक्रिया से तय होना है। विमला देवी पक्ष के लिए पुराने चकबंदी रिकॉर्ड, 1991 के वरासत आदेश, 2007 के हाईकोर्ट आदेशों की पूरी श्रृंखला, बाद की रजिस्ट्री, 2021 में नामांतरण निरस्तीकरण, सिविल वाद 600/2021, राजस्व वाद 19,82/2021/5957/2023 तथा राम सुरेश के पक्ष में जारी पत्थरगड़ी आदेश महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब जमीन का मालिकाना और कब्जा अदालतों में विचाराधीन था, नामांतरण निरस्त हो चुका था और कई न्यायिक कार्यवाहियां लंबित थीं, तो प्रशासनिक स्तर पर किस आधार पर एक पक्ष को कब्जा दिलाया गया? इसका जवाब संबंधित न्यायालयीन और प्रशासनिक अभिलेखों की जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।
विमला देवी पक्ष की मांग है कि सभी मूल अभिलेखों, लंबित मुकदमों और हाईकोर्ट के आदेशों की जांच कराकर विवादित जमीन की स्थिति स्पष्ट की जाए और न्यायालय के अंतिम निर्णय तक किसी भी पक्ष के अधिकार को प्रभावित करने वाली कार्रवाई न की जाए।
अमरनाथ झा पत्रकार -9415254415
