सोनभद्र में सबसे ज्यादा आकाशीय बिजली क्यों गिर रही:इसी मानसून में 14 की जान गई; 2 मंजिला मकान पर लाइटनिंग सिस्टम लगाना जरूरी
यूपी के सोनभद्र जिले में सबसे ज्यादा आकाशीय बिजली गिरती है। इस मानसून सीजन में ही 14 लोगों की मौत हो चुकी है। पिछले साल 29 लोगों की जान गई थी। हालात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सोनभद्र में एक मंजिल से ऊंची इमारतों पर ‘लाइटनिंग अरेस्टर’ लगाना अनिवार्य कर दिया गया है। यह सिस्टम बिजली को गिरने से रोकता है। यूपी में बिजली गिरने की 75% घटनाएं सोनभद्र और उससे सटे जिलों मिर्जापुर, चंदौली में होती हैं। वैज्ञानिक इसके पीछे कई वजह बताते हैं, जिनमें कुछ चौंकाने वाली हैं। आखिर ऐसा क्यों होता है, आइए समझते हैं… वैज्ञानिक बोले- पहाड़, चट्टानें बिजली के लिए आसान रास्ता सोनभद्र जिला चार राज्यों के बॉर्डर पर बसा है। इसकी आबादी करीब 18 लाख है। यहां आसपास के दूसरे जिलों के मुकाबले ज्यादा पहाड़ हैं। लखनऊ के आंचलिक मौसम विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अतुल कुमार सिंह कहते हैं- पूर्वी यूपी के दक्षिणी हिस्से यानी सोनभद्र, मिर्जापुर और चंदौली में सबसे ज्यादा आकाशीय बिजली गिरती है। मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों की वजह से यह इलाका बिजली गिरने के लिहाज से सबसे संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। इसके पीछे 2 बड़े वैज्ञानिक कारण माने जाते हैं- यहां की जमीनें आकाशीय बिजली को अपनी तरफ खींच रहीं वैज्ञानिकों के मुताबिक, सोनभद्र की जमीन के नीचे मौजूद खनिज बिजली की अच्छे सुचालक (जो करंट को पास होने दें) होते हैं। जब बादलों में तेज इलेक्ट्रिक चार्ज बनता है, तो जमीन के अंदर मौजूद ये खनिज नेचुरल कंडक्टर की तरह काम करते हैं और बिजली को अपनी ओर खींच लेते हैं। लखनऊ स्थित राज्य आपदा प्रबंधन विभाग (SDMA) के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, गर्म और ठंडी हवाएं आपस में टकराने से बादलों में पॉजिटिव और नेगेटिव चार्ज बनते हैं। जब इन दोनों के बीच चार्ज का अंतर बहुत बढ़ जाता है, तो बिजली डिस्चार्ज होकर जमीन की ओर आती है। ऐसे में वह सबसे पहले ऊंची जगहों, जैसे पहाड़ियों और ऊंचे पेड़ों पर गिरती हैं। कोयला खदान, थर्मल पावर प्लांट से संतुलन बिगड़ा
आकाशीय बिजली बनना और उसका धरती पर गिरना पूरी तरह प्राकृतिक घटना है, लेकिन बढ़ता तापमान, प्रदूषण और अंधाधुंध जंगलों की कटाई से आकाशीय बिजली गिरने की घटनाएं बढ़ती हैं। सोनभद्र में इसके पीछे ये फैक्टर काम करते हैं- 1. राख-धुएं के कण हवा में फैले – सोनभद्र में 6 बड़े थर्मल पावर प्लांट और 12 कोयला खदानें हैं। यूपी में कुल थर्मल पावर का लगभग 35% से 40% अकेले सोनभद्र जिले से बिजली पैदा होती है। लेकिन कोयला जलने से निकलने वाले राख और धुएं के बेहद बारीक कण हवा में फैल जाते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये कण बादलों के अंदर इलेक्ट्रिक चार्ज तेजी से बनने में मदद करते हैं, जिससे बिजली ज्यादा बनती है। 2. ग्लोबल वार्मिंग – फैक्ट्रियों, प्लांट और थर्मल प्लांट से निकलने वाली गैसों की वजह से धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, तापमान में हर 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी से बादलों में बिजली बनने की संभावना करीब 12% तक बढ़ जाती है। 3. जंगल की कटाई – पेड़ वातावरण को ठंडा रखने और नमी बनाए रखने में मदद करते हैं। लेकिन जंगल कटने से यह संतुलन बिगड़ चुका है। 32 जगहों पर लाइटनिंग अर्ली वॉर्निंग सिस्टम लगे सोनभद्र के जिला आपदा विशेषज्ञ अरुण यादव के मुताबिक, जिले में कुल 32 जगहों पर लाइटनिंग अर्ली वॉर्निंग सिस्टम लगाए गए हैं। इनमें दुद्धी ब्लॉक में 31 जगह और एक कलेक्ट्रेट में लगा है। यह आकाशीय बिजली गिरने से पहले सायरन के जरिए लोगों को अलर्ट करता है। ताकि लोगों को बचाव का मौका मिले। आसमानी बिजली गिरने पर मिलता 4 लाख तक मुआवजा उत्तर प्रदेश राहत आयुक्त कार्यालय के नियमों के अनुसार, आकाशीय बिजली से मृत्यु होने पर परिवार को 4 लाख रुपए की आर्थिक सहायता सीधे बैंक खाते में दी जाती है। गंभीर रूप से घायल या 60% से अधिक विकलांगता होने पर ₹2 लाख, जबकि 40-60% विकलांगता पर 59,100 रुपए का मुआवजा निर्धारित है। इसके अलावा, गंभीर रूप से झुलसने पर 25 हजार रुपए तक इलाज का खर्च और दुधारू पशु की मौत पर 37,500 रुपए तक की सहायता का प्रावधान है। आकाशीय बिजली से नुकसान होने पर मुआवजे के लिए 1070 या 1077 हेल्पलाइन पर संपर्क कर सकते हैं। लेखपाल, तहसीलदार या ग्राम प्रधान को तुरंत सूचना दें। ऑनलाइन आवेदन IGRS (जनसुनवाई) और राहत पोर्टल पर भी किया जा सकता है। आकाशीय बिजली गिरने से पहले अलर्ट पाने के लिए मोबाइल में ‘दामिनी’ एप डाउनलोड करें। ————————- ये खबर भी पढ़िए UP में हल्की बारिश को बाढ़ बता रहीं मशीनें:कंपनी को पेमेंट न देने की सिफारिश; फिर भी 137 करोड़ दे दिए यूपी में हल्की बारिश होने पर मौसम विभाग की मशीनें बाढ़ जैसे हालात बता रहीं हैं। अगर बादल छा गए तो धूप खिलने का मैसेज भेज रहीं हैं। ये गड़बड़ी 2 साल पहले लगे ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन और ऑटोमैटिक रेन गेज की वजह से है। पूरी खबर पढ़िए…
