नियमों की अनदेखी से रुका विकास,निर्धन और मलिन बस्तियों के लिए निर्धारित 25% फंड पर अधिकारियों की अनभिज्ञता उजागर

0
Screenshot_20251112_090614

👉 नियमों की अनदेखी से थमा विकास, दलित बस्तियाँ अब भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित…

👉 25% फंड का कानूनी प्रावधान बना मज़ाक, अधिकारियों को नहीं है अधिनियम की जानकारी …

👉 नगर निकायों में सीमांकन और संपत्ति हैंडओवर में वर्षों से लापरवाही जारी…

👉 पत्रकार अमरनाथ झा की पहल से उजागर हुई अनियमितताएँ, फिर भी प्रशासन मौन…

👉 दलित बस्तियों में जमीनी हालात बदतर— टूटी सड़कें, बंद नालियाँ, ठप जल व्यवस्था…

👉 जानकारी का अभाव नहीं, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता और जवाबदेही की कमी…

👉 जनप्रतिनिधियों की चुप्पी से बढ़ा अविश्वास, विकास फंड की निगरानी पर उठे सवाल…

👉 शासन से अपेक्षा: जांच, कार्रवाई और अधिकारियों को नियमों का प्रशिक्षण जरूरी….

कौशाम्बी। शासन और प्रशासन की योजनाएँ तब तक कारगर नहीं हो सकतीं जब तक उन्हें जमीनी स्तर पर सही तरीके से लागू न किया जाए। कौशाम्बी जिले में नगर निकायों की लापरवाही और अधिकारियों की नियमों के प्रति अनभिज्ञता इसी सच्चाई को उजागर करती है। नगर पालिका परिषद मंझनपुर और भरवारी के गठन को कई वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन अब तक न तो दोनों निकायों का सीमांकन (demarcation) कराया गया है और न ही सार्वजनिक संपत्तियों (Public Properties) का तहसीलों से विधिवत हैंडओवर किया गया है। इसका सीधा असर विकास कार्यों पर पड़ रहा है। यही हाल जिले के सभी नगर पालिकाओ का भी है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि नगर निकायों को मिलने वाले विकास फंड (Development Fund) का 25 प्रतिशत भाग निर्धन और मलिन बस्ती / अनुसूचित जाति एवं जनजाति बहुल इलाकों में खर्च करने का जो वैधानिक प्रावधान है, उसकी जानकारी तक स्थानीय अधिकारी तथा ई0ओ, एडीएम और इंजीनियर नहीं रखते। परिणामस्वरूप, दलित बस्तियों में विकास कार्य ठप पड़े हैं और वहां की सड़कों, नालियों, पेयजल व्यवस्था तथा स्वच्छता की स्थिति बद से बदतर बनी हुई है।
कानूनी प्रावधान और प्रशासनिक उपेक्षा
उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम, 1916 (U.P. Municipalities Act, 1916) एवं नगर निगम अधिनियम के अनुसार, प्रत्येक नगर निकाय को अपने वार्षिक बजट में विकास योजनाओं के लिए मिलने वाली धनराशि का 25 प्रतिशत हिस्सा अनुसूचित जाति/जनजाति क्षेत्रों में खर्च करना अनिवार्य है। यह प्रावधान सामाजिक समरसता और संतुलित विकास के उद्देश्य से किया गया था, ताकि हाशिए पर पड़े वर्गों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंच सकें।
लेकिन, कौशाम्बी जिले में यह नियम सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया है। स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी, नगर निकाय के ईओ (Executive Officer) और संबंधित इंजीनियरों को इस प्रावधान की सही जानकारी नहीं है। कई बार जब पत्रकारों या सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस मुद्दे पर सवाल उठाए, तो अधिकारियों का जवाब रहा—“ऐसा कोई नियम नहीं है।” यह बयान खुद प्रशासन की नीयत और तैयारी पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
पत्रकारिता की पहल और प्रशासन की चुप्पी
स्थानीय पत्रकार अमरनाथ झा ने इस मामले को कई बार प्रमुखता से उठाया। उन्होंने नगर पालिका परिषद मंझनपुर और भरवारी की अनियमितताओं, एवं सीमांकन न होने, तथा पब्लिक प्रॉपर्टी के हैंडओवर में देरी को लेकर समाचार प्रकाशित किए। बावजूद इसके, संबंधित अधिकारियों ने न तो इस पर कोई संज्ञान लिया, न ही शासन स्तर से कोई जांच बैठाई गई। इससे साफ है कि अधिकारी और जनप्रतिनिधि केवल टेंडर प्रक्रिया और कमीशनखोरी तक सीमित हैं, जबकि जनता की मूलभूत जरूरतें उनकी प्राथमिकता सूची में शामिल नहीं हैं।
दलित बस्तियों में जमीनी हकीकत
कौशाम्बी के दलित बस्तियों में जाकर देखने पर स्थिति बेहद दयनीय है। नालियां साफ नहीं हैं, सड़के ठीक नहीं है,गड्ढे हैं, और पेयजल की व्यवस्था लगभग बनी हुई है। स्वच्छता मिशन के बावजूद सफाई व्यवस्था अस्त-व्यस्त है। स्थानीय लोग बताते हैं कि वर्षों से कोई ठोस विकास कार्य नहीं हुए। “हर साल बजट आता है, लेकिन हमारे इलाके में कोई काम नहीं दिखता,” एक निवासी ने बताया।
नियमन की जानकारी का अभाव या जानबूझकर अनदेखी?
जानकारों का कहना है कि यह केवल जानकारी का अभाव नहीं, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता और जवाबदेही की कमी का परिणाम है। नगर निकाय नियमावली के तहत प्रत्येक वित्तीय वर्ष में SC/ST क्षेत्रों के विकास के लिए अलग से योजना बनाकर उसे क्रियान्वित करना होता है। लेकिन बजट के इस हिस्से को या तो अन्य मदों में खर्च कर दिया जाता है या फिर फाइलों में दबा दिया जाता है। अधिनियम में अध्याय 4 में यह  है की नगरपालिक निधि और संपत्ति में 114 की धारा 3 की उपधारा 2 में अस्पष्ट लिखा है कि जो भी फंड होगा उसमें 25 प्रतिशत धन निर्धन ,मलिन बस्ती को चिन्हित कर वहां विकाश किया जाएगा।
जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में
जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। वे अपने क्षेत्र की समस्याओं को लेकर आवाज नहीं उठा रहे हैं। जब नियम और अधिनियम स्पष्ट रूप से यह कहते हैं कि दलित क्षेत्रों में 25 प्रतिशत फंड अनिवार्य रूप से खर्च किया जाए, तो इस पर निगरानी रखने की जिम्मेदारी निर्वाचित प्रतिनिधियों की भी बनती है।
शासन से अपेक्षा
अब सवाल यह उठता है कि जब नियमों के रहते भी विकास नहीं हो रहा है, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी? शासन को चाहिए कि इस मामले में तत्काल जांच कराए और उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करे जिन्होंने विकास फंड के उपयोग में लापरवाही बरती है। साथ ही नगर निकाय कर्मियों को प्रशिक्षण देकर नियम-कानूनों की जानकारी दी जाए, ताकि योजनाओं का लाभ वास्तव में वंचित और दलित समुदायों तक पहुंच सके।
यदि शासन और प्रशासन ने अब भी इस पर गंभीरता नहीं दिखाई, तो “सबका साथ, सबका विकास” का नारा केवल कागजों और भाषणों तक सीमित रह जाएगा।

अमरनाथ झा पत्रकार – कौशाम्बी (8318977396)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

मुख्य ख़बरें