👉 प्लाटिंग कर भूमाफिया ने बेची करोड़ की कुर्क जमीन, एसआईटी और सीबीआई से टीम गठित कर जांच की उठी मांग
प्रयागराज/ कौशाम्बी। उत्तर प्रदेश के कौशाम्बी जिले से सनसनीखेज़ खुलासा सामने आया है, जिसने प्रशासन की कार्यशैली और ईमानदारी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सूत्रों की माने तो मामला गैंगस्टर खुशी केसरवानी की करोड़ों की कुर्क ज़मीन से जुड़ा है, जिसे 2020 में गैंगस्टर एक्ट के तहत प्रशासन ने कुर्क किया था। नियमों के मुताबिक, कुर्क की गई ज़मीन पर खरीद-फरोख्त, प्लॉटिंग या किसी भी तरह का लेन-देन पूरी तरह प्रतिबंधित होता है। बावजूद इसके, अब आरोप सामने आए हैं कि प्रशासन की मिलीभगत से इस ज़मीन की प्लॉटिंग की गई और करोड़ों रुपये में बिक्री कर दी गई।
कुर्क की गई ज़मीन पर हुआ बड़ा खेल
वर्ष 2020 में जिला प्रशासन ने गैंगस्टर खुशी केसरवानी के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए उसकी दो महत्वपूर्ण संपत्तियाँ कुर्क की थीं—
- गाटा संख्या 935 (भड़ेसर)
- गाटा संख्या 1123क (कोर्रो)
इन दोनों संपत्तियों को सिराथू और मंझनपुर तहसील प्रशासन की निगरानी में सुरक्षित रखा गया था। इसके बावजूद, अब जो तथ्य सामने आए हैं, उनसे प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। बताया जा रहा है कि भूमाफियाओं ने प्रशासनिक संरक्षण में इन ज़मीनों की प्लॉटिंग कर दी और खुलेआम करोड़ों रुपये में बिक्री की।
👉 प्रशासन की भूमिका संदिग्ध, ज़ीरो टॉलरेंस नीति पर सवाल
स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस पूरे प्रकरण में तहसील प्रशासन, राजस्व विभाग, पुलिस और भूमाफियाओं की मिलीभगत रही है। सवाल यह भी है कि जब ज़मीन प्रशासनिक निगरानी में कुर्क थी, तो खरीद-फरोख्त कैसे संभव हुई। इस घटना ने न केवल जिला प्रशासन बल्कि राज्य सरकार की “ज़ीरो टॉलरेंस” नीति पर भी गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्रदेश सरकार लगातार दावा करती रही है कि अपराधियों और भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई की जा रही है। लेकिन इस मामले ने यह साबित कर दिया है कि गैंगस्टरों और अफसरों की साठगांठ के चलते सरकारी नीतियाँ ध्वस्त हो रही हैं।
👉 CBI या SIT जांच की मांग तेज
इस पूरे मामले में CBI या SIT जांच की मांग जोर पकड़ रही है। ज़मीन की बिक्री में शामिल प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों की पहचान कर उनके खिलाफ तत्काल कार्रवाई की आवाज़ बुलंद हो रही है। साथ ही, गैंगस्टर खुशी केसरवानी पर भी कठोर कानूनी कार्रवाई की जरूरत बताई जा रही है।
यह मामला न सिर्फ कौशाम्बी प्रशासन की साख पर चोट करता है, बल्कि प्रदेश की कानून-व्यवस्था और शासन पर भी गहरे सवाल खड़ा करता है। अब देखना यह है कि शासन इस पूरे प्रकरण पर कितनी गंभीरता से कदम उठाता है और क्या इसमें उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए जाते हैं।