संदीपनघाट थाने में अपराध दर्ज करने की रफ्तार पर सवाल, फरियादियों की सुनवाई की जांच जरूरी

0
Screenshot_2026-10-15-04-45-39-63_948cd9899890cbd5c2798760b2b95377~2

👉 संदीपनघाट थाने में अपराध का ग्राफ घटा या मुकदमों पर लगा पहरा ?
👉 फरियादियों की सुनवाई पर सवाल, 15 अक्टूबर तक सिर्फ 13 रिपोर्ट दर्ज…
👉 जुलाई में 47, अगस्त में 41, सितंबर में 29 मुकदमे—अक्टूबर के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता..
👉 थाना प्रभारी की कार्यशैली और लंबित विवेचनाओं की निष्पक्ष जांच की उठी मांग..
👉 जुलाई में 47, अगस्त में 41 और सितंबर में 29 मुकदमे दर्ज; 15 अक्टूबर तक केवल 13 रिपोर्ट दर्ज होने के आंकड़े पर उठे सवाल…
कौशाम्बी। संदीपनघाट थाने में दर्ज मुकदमों की संख्या और फरियादियों की शिकायतों पर कार्रवाई को लेकर सवाल उठने लगे हैं। उपलब्ध कराए गए अपराध संख्या के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई 2026 में 47, अगस्त में 41 और सितंबर में 29 मुकदमे दर्ज किए गए। वहीं, 15 अक्टूबर तक केवल 13 रिपोर्ट दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। इन आंकड़ों के आधार पर थाना प्रभारी की कार्यशैली और शिकायतों पर प्राथमिकी दर्ज करने की प्रक्रिया की समीक्षा की मांग उठ रही है।
तीन महीने में दर्ज मुकदमों की संख्या में गिरावट
दिए गए विवरण के अनुसार, जुलाई में अपराध संख्या 133/26 से 180/26 तक, अगस्त में 181/26 से 223/26 तक और सितंबर में 225/26 से 255/26 तक मुकदमे दर्ज हुए। अक्टूबर में 15 तारीख तक 13 रिपोर्ट दर्ज होने की बात कही जा रही है। हालांकि, अपराध संख्या की श्रृंखला और वास्तविक दर्ज मुकदमों की संख्या का थाने के आधिकारिक रिकॉर्ड से मिलान जरूरी है, ताकि आंकड़ों की सही तस्वीर सामने आ सके।
क्या सभी फरियादियों की शिकायतें दर्ज हो रही हैं?
स्थानीय स्तर पर आरोप हैं कि कई फरियादियों की शिकायतों पर प्राथमिकी दर्ज नहीं की जाती और उन्हें थाने के चक्कर लगाने पड़ते हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। ऐसे में यह जांच महत्वपूर्ण है कि कितनी शिकायतें थाने में प्राप्त हुईं, कितनों पर एफआईआर दर्ज की गई, कितनों को गैर-संज्ञेय रिपोर्ट या अन्य प्रक्रिया में लिया गया और कितने मामलों में शिकायतकर्ताओं को बिना मुकदमा दर्ज किए लौटाया गया।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और कानून का पालन जांच के दायरे में
संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173 के प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञेय अपराध का खुलासा करने वाली सूचना पर एफआईआर दर्ज करने के सिद्धांत को स्पष्ट किया था; सीमित श्रेणियों में प्रारंभिक जांच की अनुमति कानून और निर्णय में निर्धारित शर्तों के अधीन है। इसलिए शिकायतों को दर्ज न किए जाने के आरोपों की जांच शिकायत रजिस्टर, जनरल डायरी (जीडी), प्राप्त प्रार्थना पत्रों और एफआईआर रिकॉर्ड के मिलान से की जानी चाहिए।
विवेचनाओं की स्थिति की भी हो समीक्षा….
केवल मुकदमों की संख्या से अपराध नियंत्रण या पुलिस की कार्यप्रणाली का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। जरूरी है कि लंबित विवेचनाओं, निर्धारित समय में पूरी हुई जांच, अंतिम रिपोर्ट, आरोपपत्र, लंबित शिकायतों और एफआईआर दर्ज न होने के आरोपों की भी समीक्षा हो। पुलिस अधीक्षक से मांग की जा सकती है कि संदीपनघाट थाने के जुलाई से 15 अक्टूबर 2026 तक के रिकॉर्ड का निष्पक्ष परीक्षण कराएं और यदि शिकायत दर्ज करने में जानबूझकर लापरवाही या नियमों की अनदेखी सामने आती है, तो जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए….
मुख्य सवाल यही है—क्या थाने में अपराध कम हुए हैं, या शिकायतों और दर्ज मुकदमों के आंकड़ों के बीच अंतर की वजह कुछ और है? इसका जवाब आधिकारिक रिकॉर्ड और निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है।
अमरनाथ झा पत्रकार -9415254415

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

मुख्य ख़बरें