अखिलेश के सहयोगी दल चवन्नी से रुपया बने या नहीं:लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 1 से 6, बसपा 0 से 10 हुई; जयंत-राजभर भी मजबूत हुए
कुछ गठबंधन ऐसे किए हम लोगों ने, जाने कहां-कहां से आ गए थे गठबंधन वाले। बताओ, हमने चवन्नी का रुपया बना दिया, तब भी हमें छोड़कर चले गए। – अखिलेश यादव, 16 अगस्त सपा प्रमुख का यह बयान राष्ट्रीय लोक दल प्रमुख जयंत चौधरी पर तंज था। अब जयंत के समर्थक विरोध कर रहे हैं। बसपा प्रमुख मायावती भी इस बयान पर भड़क गई हैं। उन्होंने अखिलेश को अहंकारी बताते हुए कहा- यह उनके अमर्यादित आचरण का सबूत है। जयंत चौधरी ही नहीं, पूरे जाट समाज से माफी मांगनी चाहिए। अब सवाल है कि अखिलेश के चवन्नी वाले बयान में सच्चाई कितनी है? क्या अलग-अलग चुनाव में सपा से जुड़ने वाली पार्टियां वाकई रुपया बन गईं? आज की संडे बिग स्टोरी में हम पिछले 4 चुनाव का एनालिसिस करेंगे कि अखिलेश के साथ गठबंधन से सहयोगियों की किस्मत चमकी या उन्हें सियासी नुकसान उठाना पड़ा? 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा यूपी की 62 सीटों पर चुनाव लड़कर 37 सीटों पर जीती थी। पिछले 2 चुनाव से वो 5-5 सीटें ही हासिल कर पा रही थी। इस चुनाव में उसके सहयोगी दलों को इस तरह से फायदा हुआ- कांग्रेस का कमबैक- कांग्रेस गठबंधन के तहत 17 सीटों पर चुनाव लड़ी और 6 सीटें जीतने में कामयाब रही। 2019 के चुनाव में कांग्रेस को यूपी में महज 1 सीट रायबरेली मिली थी, जबकि अमेठी से पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी चुनाव हार गए थे। तब कांग्रेस सपा गठबंधन में नहीं थी। जन अधिकार पार्टी को पहली बार सांसद मिला- पार्टी प्रमुख बाबू सिंह कुशवाहा कभी बसपा सरकार में कद्दावर नेता हुआ करते थे। NRHM घोटाले में नाम आने के बाद 2 चुनाव हार चुके थे। 2024 में अखिलेश ने उन्हें जौनपुर लोकसभा सीट से सपा के सिंबल पर उतारा, जहां वे जीत दर्ज कर पहली बार सांसद बने। तृणमूल कांग्रेस का खाता नहीं खुला- TMC प्रत्याशी ललितेश पति त्रिपाठी भदोही लोकसभा सीट से चुनाव हार गए और दूसरे स्थान पर रहे। 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले चर्चा चली कि कांग्रेस और सपा का गठबंधन होगा। लेकिन, चुनाव से ठीक पहले दोनों पार्टियों ने अलग-अलग लड़ने का ऐलान किया। रालोद- 2022 में जयंत चौधरी ने 33 सीटों पर चुनाव लड़ा, 8 पर जीते। 2017 के विधानसभा चुनाव में जयंत सिर्फ 1 सीट पर जीत सके थे। वो तब सपा के गठबंधन में नहीं थे। सुभासपा- ओम प्रकाश राजभर ने 19 सीटों पर चुनाव लड़ा, 6 पर जीत मिली। उनकी पार्टी ने पहली बार किसी विधानसभा चुनाव में 6 सीटें जीती थीं। 2017 में भाजपा के गठबंधन में थे, तब 4 सीटों पर जीते थे। 2012 में अकेले विधानसभा चुनाव लड़ा था, सभी 52 सीटों पर हार गए थे। अपना दल (क)- अपना दल (कमेरावादी) ने 6 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें सिर्फ सिराथू सीट पर जीत मिली। यहां पल्लवी पटेल ने डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य को हराया था। 2017 के विधानसभा चुनाव में अपना दल (क) के सभी उम्मीदवार हारे थे। महान दल- 2017 में केशव देव मौर्य की पार्टी महान दल ने 14 प्रत्याशी मैदान में उतारे, लेकिन सारे हार गए। 2022 के चुनाव में गठबंधन के तहत महान दल को 8 सीटें दी गई थीं। सपा के चुनाव चिह्न (साइकिल) पर चुनाव लड़ा था। उनके सभी 8 उम्मीदवार चुनाव हार गए। जनवादी पार्टी- 2017 में जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट) चुनाव मैदान में उतरी और उसे 0 सीटें हासिल हुई थीं। 2022 में जनवादी पार्टी ने सपा के गठबंधन में चुनाव लड़ा। अखिलेश ने उन्हें बिंदकी विधानसभा दी थी। हालांकि, जनवादी पार्टी भी 0 सीटों पर सिमट गई थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा करीब ढाई दशक बाद एक साथ एक मंच पर आए। कांग्रेस की अमेठी-रायबरेली सीट पर सपा-बसपा ने प्रत्याशी नहीं उतारे। बसपा- 38 सीटों पर बसपा, 37 सीटों पर सपा ने चुनाव लड़ा। बसपा को 10 सीटों पर जीत मिली। सपा को सिर्फ 5 सीटों पर ही जीत मिल सकी। इस गठबंधन में सबसे ज्यादा फायदा बसपा को हुआ। 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का खाता नहीं खुला था। चुनाव के बाद बसपा ने सपा से गठबंधन तोड़ लिया। रालोद- रालोद 3 सीटों पर लड़ी। गठबंधन की तीसरी पार्टी रालोद सभी सीटें हार गई। 2017 का चुनाव सपा बुरी तरह से हार गई थी। पार्टी ने 298 सीटों पर चुनाव लड़ा और महज 47 सीटों पर सिमट गई। पार्टी ने इस चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन किया था। कांग्रेस- पार्टी ने 105 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे, उसे सिर्फ 7 सीटों पर ही जीत मिली थी। 2012 के चुनाव में कांग्रेस के 28 विधायक जीते थे। इस चुनाव में पार्टी को 21 सीटों का नुकसान हुआ था। एक्सपर्ट बोले- पिछले 3 चुनाव में सपा के साथ रहे बड़े दलों को फायदा हुआ सपा गठबंधन में किस दल को कितना फायदा हुआ, इसको लेकर वरिष्ठ पत्रकार समीरात्मज मिश्र कहते हैं- भाजपा की तुलना में सपा ने अपने सहयोगियों को ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़वाया है। इसके सियासी कारण अलग-अलग हो सकते हैं। लेकिन, देखा जाए तो ये भी सम्मान की बात है कि कोई पार्टी आपको ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने का मौका दे रही है। फिर कोई पार्टी जीते या हारे ये अलग विषय है। देखा जाए तो चवन्नी से रुपया बनाने वाला बयान पिछले 3 चुनाव के संदर्भ में ठीक लगता है। 2024 के लोकसभा चुनाव, 2022 का विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में जो भी बड़ी पार्टियां सपा के गठबंधन में रहीं। उन्हें फायदा हुआ। इससे पहले हार-जीत का ट्रेंड देखें, तो 2017 में सिर्फ कांग्रेस गठबंधन में थी। उसको 21 सीटों का नुकसान हुआ था। इससे पहले 2012 में सपा की खुद की सरकार थी, वो किसी के साथ गठबंधन में नहीं रही थी। रहा सवाल चवन्नी शब्द का, तो इसका इस्तेमाल सबसे पहले जयंत चौधरी ने किया था। बाद में वह पलटकर भाजपा के साथ चले गए। सपा प्रवक्ता बोले- हमने हमेशा सहयोगी दलों को आगे बढ़ाया सपा प्रवक्ता मनोज काका कहते हैं- पार्टी ने हमेशा से अपने गठबंधन सहयोगी को ज्यादा मौका दिया है। आप आंकड़े उठाकर देख लीजिए, कांग्रेस 1 सीट पर थी, 2024 में हमारे साथ आई तो 6 पर पहुंच गई। 2019 में बसपा को 10 सीटें मिलीं, जबकि पहले वह 0 पर थी। जयंत सिंह भी अपनी पार्टी का पुराना आंकड़ा देख लें। अखिलेश यादव ने चवन्नी से रुपया वाले में किसी का नाम नहीं लिया। अब जयंत अगर यह कहें कि ये जाट समुदाय का अपमान है, तो ये गलत बात है। क्योंकि जाट समाज में तो हमारी पार्टी के भी विधायक-सांसद हैं। चौधरी चरण सिंह आज भी हम लोगों के आदर्श हैं। उनके राजनीतिक मूल्यों और विचारों के साथ अगर कोई राजनीति कर रहा है तो वह सपा और अखिलेश यादव ही हैं। —————————- यह खबर भी पढ़ें- मायावती बोलीं- अखिलेश अहंकारी, जयंत से माफी मांगें, ‘चवन्नी से रुपया बना दिया’ कहना शर्मनाक अखिलेश यादव के ‘चवन्नी से रुपया बना दिया…’ बयान पर बसपा प्रमुख मायावती भड़क गई हैं। सपा प्रमुख को अहंकारी बताते हुए उन्होंने कहा- यह उनके अमर्यादित आचरण का सबूत है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के परिवार का अपमान किया। अखिलेश को तुरंत न सिर्फ रालोद नेता जयंत चौधरी, बल्कि पूरे जाट समाज से माफी मांगनी चाहिए। इतना ही नहीं, सपा ने ब्राह्मणों का हमेशा से उत्पीड़न किया है। पढ़िए पूरी खबर…
