रेल मंत्री और प्रधानमंत्री का ध्यान आकर्षित कराएंगे रेलवे ठेकेदार, संशोधित ओबीएचएस नीति के खिलाफ आंदोलन के संकेत, गलत नीति से रेलवे बोर्ड के अधिकारी रेलवे को लगा रहे चूना

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Kaushambi voice

👉 प्रधानमंत्री और रेल मंत्री तक पहुंचेगा रेलवे ठेकेदारों का विरोध, संशोधित नीति पर उठे सवाल…

👉 रेलवे की नई ओबीएचएस नीति के खिलाफ लामबंद ठेकेदार, पीएम और रेल मंत्री से न्याय की गुहार..

👉 पुराने ठेकेदारों का काम छीनने का आरोप, रेलवे बोर्ड के बाद अब प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की मांग..

👉 रेलवे बोर्ड को भेजा गया विस्तृत ज्ञापन, पुराने ठेकेदारों को काम से बाहर करने और सीमित निविदा प्रक्रिया पर उठाए सवाल..

👉 नई नीति से रेलवे का 1500 करोड़ से ज्यादा का हो रहा नुकसान, जो कार्य पहले चल रहा था ,वही कार्य को 5 गुना ज्यादा पैसा देकर किया जा रहा टेंडर..

MSME को बाहर करने का नया तरीका,7 बड़ी कंपनियों में भारत को बांटकर टेंडर में देंगे जगह, प्रयागराज में 5 ट्रेनों का निकाला गया टेंडर…

प्रयागराज/नई दिल्ली। भारतीय रेलवे की संशोधित ऑन-बोर्ड हाउसकीपिंग सर्विसेज (ओबीएचएस) और लिनन वितरण नीति को लेकर रेलवे ठेकेदारों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। अपनी समस्याओं और मांगों को लेकर अखिल भारतीय रेलवे ओबीएचएस एवं लिनन ठेकेदारों ने अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय रेल मंत्री का ध्यान इस मामले की ओर आकर्षित कराने की तैयारी की है। ठेकेदारों ने रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी को विस्तृत ज्ञापन भेजकर संशोधित नीति की निष्पक्ष समीक्षा और पुरानी व्यवस्था से जुड़े अनुभवी ठेकेदारों को न्याय दिलाने की मांग उठाई है।
ज्ञापन में कहा गया है कि फरवरी-मार्च 2026 में लागू संशोधित नीति के तहत विशेष सीमित निविदा (एसएलटी) प्रक्रिया अपनाए जाने से लंबे समय से रेलवे में काम कर रहे ठेकेदारों के सामने रोजगार और आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। ठेकेदारों का आरोप है कि एक दशक से अधिक समय तक रेलवे को सेवाएं देने के बावजूद उन्हें नई निविदा प्रक्रिया में भाग लेने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहा है। वहीं, सीमित संख्या में चयनित विक्रेताओं के बीच बड़े पैमाने पर काम केंद्रित होता जा रहा है।
निविदा प्रक्रिया में पारदर्शिता पर सवाल…
ठेकेदारों ने आरोप लगाया है कि रेलवे के नियमित सफाई, हाउसकीपिंग और लिनन वितरण जैसे कार्यों के लिए विशेष सीमित निविदा अपनाने से खुली प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो रही है। ज्ञापन में सामान्य वित्तीय नियम (जीएफआर), 2017 के नियम 162 और केंद्रीय सतर्कता आयोग के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए खुली निविदा प्रक्रिया लागू करने की मांग की गई है। ज्ञापन में दावा किया गया है कि राष्ट्रीय स्तर पर महज 7-8 बोलीदाता पात्रता हासिल कर सके, जिसके चलते कई क्षेत्रीय रेलवे में केवल 3-4 विक्रेताओं तक काम सीमित होने की स्थिति बन गई है।
पुराने ठेकेदारों के काम में कटौती से आर्थिक संकट…
ज्ञापन में यह भी आरोप लगाया गया है कि संशोधित नीति लागू करने के दौरान पुराने ठेकेदारों के चल रहे अनुबंधों से 40 से 50 प्रतिशत तक ट्रेन कार्यभार वापस लिया जा रहा है। ठेकेदारों का कहना है कि उन्होंने पूरे अनुबंध के आधार पर कर्मचारियों, पर्यवेक्षकों और अन्य संसाधनों की व्यवस्था की थी। अचानक कार्यभार कम किए जाने से उनकी आर्थिक गणना बिगड़ गई है। साथ ही प्रशिक्षित कर्मचारियों के दूसरे ठेकेदारों के यहां चले जाने से मौजूदा सेवाओं के संचालन पर भी असर पड़ने की आशंका है।
मजदूरी और कर्मचारियों की तैनाती में अलग-अलग मानक
ज्ञापन में प्रति दो कोच पर एक कर्मचारी की नई तैनाती व्यवस्था और पुराने प्रति तीन कोच पर एक कर्मचारी के मानक का भी उल्लेख किया गया है। ठेकेदारों ने सवाल उठाया है कि यदि अधिक कर्मचारियों की तैनाती से स्वच्छता में सुधार संभव है तो मौजूदा ठेकेदारों को भी समान जनशक्ति और संशोधित दरों के साथ काम करने का अवसर क्यों नहीं दिया जा रहा है। अलग-अलग क्षेत्रीय रेलवे में न्यूनतम मजदूरी की गणना के लिए अलग-अलग आधार अपनाए जाने पर भी एकरूपता की मांग की गई है।
प्रधानमंत्री और रेल मंत्री से हस्तक्षेप की मांग…
ठेकेदार संघ ने प्रधानमंत्री और रेल मंत्री से पूरे मामले का संज्ञान लेकर रेलवे बोर्ड को निष्पक्ष जांच और नीति की समीक्षा के निर्देश देने की मांग की है। उनकी प्रमुख मांगों में विशेष सीमित निविदा के स्थान पर खुली निविदा, सभी ठेकेदारों के लिए समान पात्रता मानक, न्यूनतम मजदूरी की एकसमान गणना, पुराने अनुबंधों का वित्तीय संरक्षण, कार्यभार में कटौती पर उचित मुआवजा और सीमित विक्रेता पैनल की समीक्षा शामिल है।
ज्ञापन की प्रतिलिपि केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) तथा रेलवे बोर्ड के संबंधित अधिकारियों को भी भेजी गई है। ठेकेदारों का कहना है कि उनका उद्देश्य रेलवे की यात्री सुविधाओं और स्वच्छता व्यवस्था को कमजोर करना नहीं, बल्कि पारदर्शी खरीद प्रक्रिया, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और वर्षों से सेवाएं दे रहे ठेकेदारों के हितों की रक्षा सुनिश्चित कराना है। अब सभी की निगाहें प्रधानमंत्री और रेल मंत्री के हस्तक्षेप तथा रेलवे बोर्ड की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं।

अमरनाथ झा पत्रकार -9415254415

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