प्रयागराज में बिल्डरों और नगर निगम की मिलीभगत से टैक्स चोरी का बड़ा खेल 35 से 80 लाख तक के फ्लैट बिके, फिर भी नहीं हुआ नगर निगम में पंजीकरण

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Kaushambi voice

👉🏻सैकड़ों फ्लैट बिना रजिस्ट्रेशन, सरकार को हर साल करोड़ों का राजस्व नुकसान ….
👉🏻नगर निगम अधिनियम की धारा 146-147 के तहत अनिवार्य है भवन पंजीकरण…
👉🏻निरीक्षकों की ड्यूटी तय, रिपोर्ट न देने पर बनती है कार्रवाई,फिर भी खामोश निगम—बिल्डरों पर नहीं हुई कोई ठोस कार्रवाई

👉🏻  अमरनाथ झा की रिपोर्ट।

प्रयागराज । शहर में बिल्डरों और नगर निगम की मिलीभगत से राजस्व चोरी का एक बड़ा खेल सामने आया है। शहर में सैकड़ों बिल्डर हैं जो 35 लाख से लेकर 80 लाख रुपये तक के फ्लैट बनाकर बेचते हैं, लेकिन इनका नगर निगम में पंजीयन (रजिस्ट्रेशन) तक नहीं होता। बिल्डर बिक्री के बाद अपनी जिम्मेदारी समाप्त मान लेते हैं, जबकि नगर निगम अधिकारी टैक्स वसूली की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाते।

नगर निगम अधिनियम, 1959 की धारा 146 एवं 147 के तहत हर भवन, चाहे वह व्यक्तिगत हो या व्यावसायिक, उसका पंजीकरण अनिवार्य है। इसके साथ ही, भवन पूर्ण होने के बाद मालिक या बिल्डर को निगम को सूचित करना और हाउस टैक्स निर्धारण कराना होता है। नियमों के अनुसार, नगर निगम के राजस्व निरीक्षक और भवन कर अधिकारी की यह ड्यूटी है कि वे क्षेत्र में बने नए भवनों का सर्वे कर रिपोर्ट नगर आयुक्त को सौंपें। लेकिन प्रयागराज में यह व्यवस्था कागजों तक सीमित है। नगर निगम अधिनियम की धारा 214 में यह अस्पष्ट है कि जो भी भवन या बिल्डर फ्लैट्स बनाएगा वह नगर आयुक्त को जानकारी देगा लेकिन ऐसा बिल्डर नहीं करते हैं जो टैक्स चोरी है। ऐसे में बिल्डरों पर भी कार्यवाही बनती है।

शहर के विभिन्न इलाकों—करेली, नैनी, झूंसी, कटरा, सिविल लाइंस और सुलेम सराय , मुंडेरा, मंदर, बमरौली , कालिंदीपुरम आदि—में दर्जनों ऐसे फ्लैट हैं जो बिक चुके हैं और उनमें लोग रह भी रहे हैं, फिर भी नगर निगम के अभिलेखों में उनका कोई पंजीयन नहीं है। इन बिल्डरों ने न तो भवन कर जमा किया और न ही अधिभोग प्रमाणपत्र लिया। परिणामस्वरूप, सरकार को हर वर्ष करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है।

वहीं, नगर निगम के कुछ अधिकारी भी इस खेल में परोक्ष रूप से शामिल बताए जा रहे हैं। टैक्स जमा करने वालों पर बार-बार रिवीजन की कार्रवाई होती है, जबकि अनरजिस्टर्ड बिल्डरों पर कोई सख्त कदम नहीं उठाया जाता। सूत्र बताते हैं कि नगर निगम के फील्ड इंस्पेक्टरों को हर नए भवन का विवरण आयुक्त कार्यालय में प्रस्तुत करना चाहिए, मगर अक्सर ये रिपोर्टें दबा दी जाती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नगर निगम बिल्डरों की सूची बनाकर फ्लैट परियोजनाओं की जांच कराए और पंजीयन न कराने वालों पर कार्रवाई करे, तो करोड़ों रुपये का राजस्व सरकार को मिल सकता है। अब देखने वाली बात यह है कि नगर आयुक्त और जिला प्रशासन इस टैक्स चोरी के घोटाले पर कब सख्ती दिखाते हैं यह एक बड़ा सवाल है।

अमरनाथ झा, पत्रकार, कौशाम्बी / प्रयागराज (9415254415)

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