केशव प्रसाद मौर्य के खिलाफ 11 मुकदमों का पुराना रिकॉर्ड, 3032 लोगों पर एफआईआर की खबर फिर चर्चा में आया मामला, हलफनामे में थे सात लंबित मुकदमों का उल्लेख
👉 हत्या, धोखाधड़ी, दंगा और सरकारी काम में बाधा समेत विभिन्न धाराओं में दर्ज थे मुकदमे;
👉 2014 के हलफनामे में 9.32 करोड़ की संपत्ति और 2.43 करोड़ की देनदारी का विवरण..
रिपोर्ट: अमरनाथ झा..9415254415..
कौशाम्बी/लखनऊ । उत्तर प्रदेश की राजनीति में केशव प्रसाद मौर्य का नाम उनके राजनीतिक सफर के साथ-साथ चुनावी हलफनामों में दर्ज आपराधिक मामलों को लेकर भी चर्चा में रहा है। वर्ष 2016 में उत्तर प्रदेश भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य के नेतृत्व में लखनऊ में हुए भाजपा के विरोध प्रदर्शन के बाद उनके समेत 3032 लोगों के खिलाफ हजरतगंज कोतवाली में प्राथमिकी दर्ज किए जाने की खबर प्रकाशित हुई थी। उस समय प्रदर्शन के दौरान दर्जनों पुलिस कर्मियों के घायल होने की भी सूचना सामने आई थी।
खबर लहरिया की 27 अगस्त 2016 की रिपोर्ट में 24 अगस्त को विधानसभा के सामने हुए प्रदर्शन के बाद केशव प्रसाद मौर्य समेत 3032 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने की बात कही गई थी। वहीं, इंडियन एक्सप्रेस की 25 अगस्त 2016 की रिपोर्ट में प्रदर्शन के दौरान पथराव और पुलिस कार्रवाई के बीच 12 पुलिसकर्मियों के घायल होने की जानकारी दी गई थी। इस तरह अलग-अलग रिपोर्टों में घायल पुलिसकर्मियों की संख्या अलग बताई गई है। 18 पुलिसकर्मियों के घायल होने का आंकड़ा स्वतंत्र रूप से पुष्ट नहीं हो सका है।
यह मामला वर्ष 2016 का है, न कि वर्तमान की कोई नई घटना। उस समय भाजपा ने उत्तर प्रदेश की तत्कालीन समाजवादी पार्टी सरकार के खिलाफ कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर प्रदर्शन किया था। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच टकराव हुआ था। बाद में भाजपा नेताओं ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए थे, जबकि पुलिस की ओर से प्रदर्शन के दौरान हिंसा और पथराव की बात कही गई थी।
पुराने चुनावी हलफनामे में 11 आपराधिक मामलों का उल्लेख..
राजस्थान पत्रिका की पुरानी रिपोर्ट में केशव प्रसाद मौर्य के खिलाफ हत्या, धोखाधड़ी, दंगा, सरकारी कर्मचारियों के काम में बाधा और धमकी सहित कई आरोपों से जुड़े मुकदमों का उल्लेख किया गया था। उस समय मौर्य फूलपुर से सांसद और उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के मायनेटा अभिलेखों के मुताबिक, वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में फूलपुर सीट से दाखिल उनके हलफनामे में 11 आपराधिक मामलों का विवरण था। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव के हलफनामे में चार और वर्ष 2012 के हलफनामे में नौ मामलों का उल्लेख था। वर्ष 2022 के सिराथू विधानसभा चुनाव के हलफनामे में सात आपराधिक मामलों का विवरण दर्ज है। ये अलग-अलग चुनावों के समय घोषित आंकड़े हैं; इन्हें वर्तमान में लंबित मुकदमों की संख्या नहीं माना जाना जा सकता है ।
पुराने हलफनामे में दर्ज मामलों में हत्या और आपराधिक षड्यंत्र से संबंधित मुकदमा भी शामिल था। हालांकि, किसी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दर्ज होना या अदालत में आरोपों पर सुनवाई होना दोषी सिद्ध होने के समान नहीं है। पुराने मुकदमों में बाद में क्या आदेश हुए, कितने मामलों का निस्तारण हुआ और किन मामलों को वापस लेने की प्रक्रिया चली, इसकी पुष्टि संबंधित न्यायालयों के अद्यतन अभिलेखों से ही की जा सकती है।
हत्या से लेकर धोखाधड़ी तक, हलफनामे में दर्ज थीं ये धाराएं..
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के हलफनामे में दर्ज 11 मामलों का विवरण मायनेटा पर उपलब्ध है। उनमें उल्लिखित धाराएं और संबंधित थानों एवं मुकदमों की जानकारी इस प्रकार है। नीचे दिया गया विवरण उस समय के हलफनामे का है, वर्तमान न्यायिक स्थिति का प्रमाण नहीं।
1. धारा 143, 188, 283 और 341: विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, इलाहाबाद की अदालत में मुकदमा संख्या 703/2004 और आपराधिक मुकदमा संख्या 177/2003 का उल्लेख था। संज्ञान की तारीख 25 मार्च 2004 दर्ज थी।
2. धारा 302 और 120बी तथा लोक प्रतिनिधित्व/लोक व्यवस्था से संबंधित अधिनियम की धारा 7: कौशाम्बी के कोखराज थाने से संबंधित आपराधिक मुकदमा संख्या 470/11 का विवरण था। संज्ञान की तारीख 7 नवंबर 2013 दर्ज थी। हलफनामे में इसे अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश-द्वितीय, कौशाम्बी की अदालत में सत्र परीक्षण संख्या 37/2014 के रूप में लंबित बताया गया था।
3. धारा 153ए और 188: कौशाम्बी के कोखराज थाने से संबंधित आपराधिक मुकदमा संख्या 571/11 दर्ज था।
4. धारा 147, 148, 153, 153ए, 352, 188, 323, 504 और 506 तथा लोक व्यवस्था से संबंधित अधिनियम की धारा 7: मंझनपुर थाने से संबंधित आपराधिक मुकदमा संख्या 218/11 और केस संख्या 2187/2012 का उल्लेख था। संज्ञान की तारीख 7 मई 2012 दर्ज थी।
5. धारा 147, 295ए और 153ए: मोहम्मदपुर पइंसा थाने से संबंधित आपराधिक मुकदमा संख्या 82/08 तथा केस संख्या 1281/2002 का विवरण था। संज्ञान की तारीख 5 दिसंबर 2008 दर्ज थी।
6. धारा 420, 467, 465, 171 और 188: मोहम्मदपुर पइंसा थाने से संबंधित आपराधिक मुकदमा संख्या 83/08 और केस संख्या 2715/08 का उल्लेख था। संज्ञान की तारीख 24 नवंबर 2008 दर्ज थी। इनमें धोखाधड़ी और कूटरचना से संबंधित धाराएं भी शामिल थीं।
7. धारा 147, 352, 323, 504, 506 और 392: कौशाम्बी के मंझनपुर थाने से संबंधित आपराधिक मुकदमा संख्या 72ए/2013 का विवरण दर्ज था।
8. धारा 153ए, 353, 186, 504, 147 और 332 तथा अधिनियम की धारा 7: पश्चिम विहार थाने से संबंधित आपराधिक मुकदमा संख्या 77/96 का उल्लेख था। इस प्रविष्टि में थाने के नाम और अन्य विवरण की मूल अभिलेख से दोबारा पुष्टि जरूरी है।
9. धारा 147, 323, 504, 427, 353, 506 और 380 तथा सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम की धारा 3/5 और लोक व्यवस्था से संबंधित अधिनियम की धारा 7: कर्नलगंज थाने, इलाहाबाद से संबंधित आपराधिक मुकदमा संख्या 431/98 और केस संख्या 1247/02 का विवरण था। संज्ञान की तारीख 6 मार्च 2000 दर्ज थी।
10. धारा 147, 148, 332, 336, 186 और 427 तथा अधिनियम की धारा 7: कर्नलगंज थाने, इलाहाबाद से संबंधित आपराधिक मुकदमा संख्या 02/14 का उल्लेख था।
11. धारा 143, 353 और 341: सिविल लाइंस थाने, इलाहाबाद से संबंधित आपराधिक मुकदमा संख्या 603/13 दर्ज था।
उपरोक्त 11 प्रविष्टियों का आधार वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव का सार्वजनिक हलफनामा है। इनमें उल्लिखित धाराएं पुराने रिकॉर्ड के अनुसार दी गई हैं।
दो पुराने मुकदमों को वापस लेने की प्रक्रिया की भी आई थी खबर
केशव प्रसाद मौर्य से संबंधित पुराने मामलों को लेकर नवंबर 2018 में इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट प्रकाशित की थी कि उत्तर प्रदेश सरकार ने कौशाम्बी में वर्ष 2008 के दो मुकदमों को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू करने का निर्णय लिया था। रिपोर्ट के अनुसार, संबंधित अधिकारियों को अदालत में आवेदन दाखिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश दिए गए थे।
इसका मतलब यह नहीं है कि सभी पुराने मुकदमे समाप्त हो गए थे। मुकदमा वापस लेने का सरकारी निर्णय, अदालत में आवेदन दाखिल होना और अदालत द्वारा आवेदन स्वीकार किया जाना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। प्रत्येक मुकदमे की अंतिम स्थिति जानने के लिए संबंधित अदालत का आदेश देखना भी आवश्यक है जिससे वर्तमान स्थिति का पता लग सकता है।
2007 में 1.36 करोड़, 2014 में 9.32 करोड़ रुपये की संपत्ति
केशव प्रसाद मौर्य की संपत्ति भी पुराने चुनावी हलफनामों के कारण चर्चा में रही है। मायनेटा के सार्वजनिक रिकॉर्ड के मुताबिक, वर्ष 2007 में उनकी घोषित संपत्ति 1,36,36,985 रुपये थी। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी घोषित संपत्ति बढ़कर 9,32,44,143 रुपये दर्ज हुई।
वर्ष 2014 के हलफनामे में उनकी देनदारियां 2,43,81,051 रुपये बताई गई थीं। यह आंकड़ा पुराने चुनावी हलफनामे का है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के हलफनामे में उनकी कुल घोषित संपत्ति 8,06,22,296 रुपये और देनदारियां 97,75,819 रुपये दर्ज थीं। अलग-अलग वर्षों के इन आंकड़ों से वर्तमान संपत्ति या उसकी वृद्धि के कारणों के बारे में अपने आप कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है।
पुरानी पत्रिका रिपोर्ट में पेट्रोल पंप, एग्रो ट्रेडिंग कंपनी, कामधेनु लॉजिस्टिक और जीवन ज्योति अस्पताल से जुड़े व्यावसायिक हितों का भी उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट में उनकी पत्नी की अस्पताल में भागीदारी तथा सामाजिक कार्यों के लिए कामधेनु चैरिटेबल सोसायटी बनाए जाने की बात भी कही गई थी। इन संस्थाओं के मौजूदा स्वामित्व, साझेदारी और वित्तीय स्थिति की पुष्टि संबंधित कंपनी, संस्था और नवीनतम सार्वजनिक अभिलेखों से अलग से की जानी चाहिए।
चाय बेचने और अखबार बांटने से राजनीति तक का सफर
केशव प्रसाद मौर्य के शुरुआती जीवन को लेकर प्रकाशित रिपोर्टों में बताया गया है कि उन्होंने आर्थिक कठिनाइयों का सामना किया और जीवन के शुरुआती दौर में चाय बेचने तथा अखबार बांटने जैसे काम भी किए। वह लंबे समय तक विश्व हिंदू परिषद से जुड़े रहे और बाद में सक्रिय राजनीति में आए।
वर्ष 2002 में उन्होंने इलाहाबाद पश्चिम विधानसभा सीट से भाजपा के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा। उस चुनाव में बसपा प्रत्याशी राजू पाल ने उन्हें हराया था। वर्ष 2007 में भी वह इसी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव हार गए।
वर्ष 2012 में केशव प्रसाद मौर्य सिराथू विधानसभा सीट से विधायक निर्वाचित हुए। वर्ष 2014 में उन्होंने फूलपुर लोकसभा सीट से जीत दर्ज की। इसके बाद वह उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बने और आगे चलकर राज्य सरकार में उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाली।
फूलपुर सीट से अतीक अहमद भी सांसद रह चुके थे। इस ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख पुरानी रिपोर्ट में किया गया था। हालांकि, अलग-अलग नेताओं के राजनीतिक और आपराधिक रिकॉर्ड की तुलना संबंधित सार्वजनिक दस्तावेजों के आधार पर ही की जानी चाहिए।
राजनीतिक प्रदर्शन, मुकदमे और सार्वजनिक जवाबदेही…
वर्ष 2016 के लखनऊ प्रदर्शन में 3032 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज किए जाने की खबर और वर्ष 2014 के चुनावी हलफनामे में दर्ज 11 आपराधिक मामलों का विवरण दो अलग-अलग ऐतिहासिक रिकॉर्ड हैं। दोनों को एक साथ देखने पर केशव प्रसाद मौर्य से जुड़े पुराने राजनीतिक और कानूनी घटनाक्रम सामने आते हैं।
किसी भी जनप्रतिनिधि के आपराधिक मामलों, संपत्ति और देनदारियों का आकलन करते समय चुनावी हलफनामे, प्राथमिकी, अदालत के आदेश और नवीनतम सार्वजनिक रिकॉर्ड को अलग-अलग समझना जरूरी है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के रिकॉर्ड की जांच और तथ्यों के आधार पर सवाल उठाना महत्वपूर्ण है, लेकिन आरोपों को सिद्ध अपराध के रूप में पेश करना उचित नहीं है।
स्रोत एवं तथ्य–जांच: राजस्थान पत्रिका की पुरानी रिपोर्ट, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स का मायनेटा अभिलेख, इंडियन एक्सप्रेस की अगस्त 2016 और नवंबर 2018 की रिपोर्ट तथा खबर लहरिया की 27 अगस्त 2016 की रिपोर्ट। नए या वर्तमान मामले के रूप में प्राथमिकी संख्या, घटना की तारीख और संबंधित अदालतों की अद्यतन स्थिति की पुष्टि होने के बाद भी सभी मामलों की जानकारी हो सकती है कि इस समय स्तिथि क्या है।
