कौशाम्बी: एससी/एसटी एक्ट की शिकायत पर FIR में देरी का आरोप, 20 दिन बाद भी कार्रवाई का इंतजार
👉 वीडियो साक्ष्य भेजने और चार लोगों के बयान दर्ज होने का दावा; धारा 18A के तहत प्राथमिकी के लिए प्रारंभिक जांच अनिवार्य नहीं..
👉 लोक सेवक की जानबूझकर लापरवाही साबित होने पर एससी/एसटी एक्ट की धारा 4 के तहत कार्रवाई का प्रावधान..
कौशाम्बी। अनुसूचित जाति के एक युवक ने मंझनपुर स्थित प्रीति एंटरप्राइजेज में कथित जातिसूचक गाली-गलौज, मारपीट और जान से मारने की धमकी देने के मामले में प्राथमिकी दर्ज नहीं होने पर पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। शिकायतकर्ता रोहित कुमार का आरोप है कि घटना के करीब 20 दिन बाद भी मुकदमा दर्ज नहीं हुआ है, जबकि वह थाने और पुलिस अधीक्षक को शिकायत देने के साथ ही क्षेत्राधिकारी मंझनपुर को ऑडियो-वीडियो साक्ष्य भेज चुके हैं। उनका कहना है कि चार लोगों के बयान भी दर्ज किए जा चुके हैं।


शिकायत के अनुसार, 21 सितंबर 2026 को रोहित कुमार निवासी भैला मकदूमपुर, थाना करारी, मंझनपुर के नेता नगर स्थित प्रीति एंटरप्राइजेज पर लोहे का पाइप खरीदने गए थे। वहां भुगतान को लेकर विवाद होने के बाद कथित रूप से जातिसूचक अपशब्द कहने, मारपीट करने और जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगाया गया है। शिकायतकर्ता का कहना है कि घटना के अगले दिन उन्होंने क्षेत्राधिकारी को मोबाइल के माध्यम से ऑडियो-वीडियो साक्ष्य भेजे। इसके बाद रोहित सहित चार लोगों के बयान क्षेत्राधिकारी कार्यालय में दर्ज किए गए, लेकिन प्राथमिकी दर्ज नहीं हुई।
क्या कहता है एससी/एसटी एक्ट?…
एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 18A(1)(a) में स्पष्ट प्रावधान है कि इस अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज करने के लिए प्रारंभिक जांच आवश्यक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ मामले में भी स्पष्ट किया कि यदि शिकायत से संज्ञेय अपराध प्रथमदृष्टया बनता है, तो प्राथमिकी दर्ज करने के लिए प्रारंभिक जांच की शर्त नहीं लगाई जा सकती। हालांकि, यह देखना आवश्यक है कि शिकायत में संबंधित अपराध के कानूनी तत्व मौजूद हैं या नहीं।
देरी पर पुलिसकर्मी के खिलाफ क्या कार्रवाई हो सकती है?…
अधिनियम की धारा 4 के तहत कानून और नियमों से निर्धारित कर्तव्यों की जानबूझकर उपेक्षा करने वाले संबंधित लोक सेवक को छह महीने से एक वर्ष तक के कारावास का प्रावधान है। इन कर्तव्यों में उपयुक्त धाराओं में प्राथमिकी दर्ज करना, पीड़ित या गवाहों के बयान दर्ज करना तथा जांच संबंधी जिम्मेदारियों का निर्वहन शामिल है। हालांकि, केवल प्राथमिकी में देरी होना अपने-आप अपराध सिद्ध नहीं करता। धारा 4 के तहत कार्रवाई के लिए कर्तव्य की जानबूझकर उपेक्षा और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार उसका परीक्षण आवश्यक है।


अधिनियम के नियम 7 के अनुसार, एससी/एसटी एक्ट के अपराध की जांच पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) रैंक से नीचे के अधिकारी द्वारा नहीं की जानी चाहिए। नियमों में जांच को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करने और निर्धारित अवधि में आरोपपत्र दाखिल करने का प्रावधान भी है।
रोहित कुमार ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच, प्राथमिकी दर्ज करने और शिकायत लंबित रखने के कारणों की जानकारी देने की मांग की है। अब यह देखना होगा कि पुलिस शिकायत में लगाए गए आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर क्या कार्रवाई करती है।
इस मामले में जब पत्रकार अमरनाथ झा से पुलिस अधीक्षक सत्यनारायण प्रजापत से बात हुई तो उन्होंने कहा ठीक है देखवा लेंगे यदि जांच में मामला पाया जाता है तो एफआईआर दर्ज हो जाएगी।
