‘NEET आंदोलन’ कितना बड़ा गेमचेंजर:जंतर-मंतर पर राहुल-अखिलेश साथ; क्या यूपी में मिलेगा सियासी फायदा

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'NEET आंदोलन' कितना बड़ा गेमचेंजर:जंतर-मंतर पर राहुल-अखिलेश साथ; क्या यूपी में मिलेगा सियासी फायदा

यूपी विधानसभा 2017 के चुनाव में ‘दो लड़कों’ की जोड़ी विफल रही थी, लेकिन 2024 में लोकसभा चुनाव के नतीजों ने इस केमिस्ट्री को नई ताकत दी। अब NEET मुद्दे पर जंतर-मंतर से संसद तक राहुल गांधी और अखिलेश यादव की साझा आक्रामकता की चर्चा है। दोनों नेताओं की इस जुगलबंदी का असर यूपी में भी दिखने लगा है। दोनों दल मुखर होकर छात्रों के मुद्दे पर सड़क पर उतर चुके हैं। सवाल यह है कि क्या युवाओं के गुस्से पर बनी राहुल-अखिलेश की यह जुगलबंदी यूपी में विपक्ष के लिए गेमचेंजर साबित होगी? या भाजपा अपने संगठन और सत्ता के दम पर इस चुनौती को बेअसर कर देगी? यूपी के बड़बोले नेताओं की बयानबाजी से संकट में था गठबंधन 2024 के यूपी लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस की जुगलबंदी ने भाजपा को सियासी रूप से सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया था। 2027 में भी दोनों दल गठबंधन में उतरने पर सहमति जता चुके हैं। लेकिन, सीट शेयरिंग को लेकर दोनों दलों में पेंच फंसा है। पिछले दिनों इसी सीट शेयरिंग को लेकर कांग्रेस सांसद इमरान मसूद से लेकर यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम के बयानों ने खूब सुर्खियां बटोरी थीं। दोनों नेताओं का दावा था कि कांग्रेस यूपी विधानसभा चुनाव में सपा से बराबरी की सीटों पर बात करेगी। राजेंद्र पाल गौतम ने तो कांग्रेस को यूपी में सपा का बड़ा भाई तक बता दिया था। जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन ने बदल दी क्रोनोलॉजी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का धरना जंतर-मंतर पर 20 जून से शुरू हुआ था। 20 जुलाई से शुरू हुए मानसून सत्र ने इस आंदोलन को चरम पर पहुंचाया। छात्रों के इस आंदोलन में राहुल गांधी सबसे पहले शामिल हुए। अगले दिन सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी सांसदों के साथ इस प्रदर्शन में शामिल हुए। दोनों युवा नेताओं की जुगलबंदी सड़क से लेकर संसद और जेल जाने तक दिखी। संसद के अंदर दोनों दलों ने सरकार से NEET जैसे मसले पर चर्चा कराने की पुरजोर मांग रखी और संसद नहीं चलने दी। 21 जुलाई को राहुल ने पीएम आवास पर धरना दिया। इस धरने में अखिलेश यादव भी अपने सांसदों के साथ शामिल हुए। राहुल सहित अन्य कांग्रेसी नेताओं के साथ अखिलेश यादव और दूसरे सपा नेताओं की भी गिरफ्तारी हुई। राहुल-अखिलेश की गिरफ्तारी का असर यूपी में सबसे ज्यादा दिखा अखिलेश-राहुल की गिरफ्तारी का असर सबसे ज्यादा यूपी में दिखा। यहां सपा-कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ताओं ने लखनऊ से लेकर अलग-अलग जिलों में जमकर प्रदर्शन किए। कई जगह पुलिस से झड़प भी हुई। कांग्रेस-सपा के कई नेताओं की गिरफ्तारी तक हुई। इन प्रदर्शनों में दोनों दलों की छात्र संगठन अग्रिम मोर्चे पर दिखे। दोनों पार्टी से जुड़े सूत्र बताते हैं कि सपा-कांग्रेस इसी तरह का विरोध प्रदर्शन विधानसभा के मानसून सत्र में भी करने की तैयारी में हैं। इसमें श्रीराम मंदिर चढ़ावा, खाद की किल्लत, नकली दवाओं और बिजली के बढ़ाए गए भार जैसे मुद्दे शामिल होंगे। बेरोजगारी, पेपर लीक मुद्दे को यूपी चुनाव तक जीवित रखने की रणनीति अखिलेश का राहुल के साथ खड़ा होना यूपी की सियासत के लिए खास तौर पर अहम है। क्योंकि, सपा का मुख्य वोटबैंक यूपी है। कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर युवाओं और शहरी मध्य वर्ग में अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रही है। दोनों पार्टियां बेरोजगारी और पेपर लीक जैसे मुद्दे को यूपी में भी लगातार उठाती रही हैं। नीट विवाद के बाद अब दोनों पार्टियां बेरोजगारी के मुद्दे पर मुखर हैं। ऐसे में यह तय है कि उनकी कोशिश इन मुद्दों को चुनाव तक जीवित रखने की होगी। यूपी में भाजपा पिछले दो टर्म से सत्ता में है। 2024 लोकसभा चुनाव में NDA को झटका लगा, लेकिन उपचुनावों के नतीजों ने बताया कि उसकी ताकत बरकरार है। तब कांग्रेस एक भी सीट पर नहीं उतरी थी। इन नतीजों से साफ है कि अखिलेश-राहुल की जुगलबंदी ही 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को चुनौती दे सकती है। पहला- मुस्लिम-यादव समीकरण सपा का मजबूत आधार है। दूसरा- कांग्रेस के जरिए अगर ब्राह्मण, दलित और युवा वोट में सेंध लगती है, तो गठबंधन की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। यूपी में क्यों मायने रखती है यह जोड़ी? वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्रा इसका जवाब देते हुए कहते हैं- 2027 में भाजपा तीसरे टर्म के लिए चुनाव में होगी। ऐसे में तीन तस्वीरें बन सकती हैं… पहली- जाहिर-सी बात है कि सरकार से नाराज वोटर्स की एक बड़ी संख्या है, जो एक नए मजबूत विकल्प की ओर शिफ्ट हो सकता है। दूसरी- हर चुनाव में 10 से 12% फ्लोटिंग वोट पड़ते हैं। ये वोट सपा-कांग्रेस गठबंधन के पाले में जा सकते हैं। तीसरी- अखिलेश यादव पर भले ही मुस्लिम-यादव का ठप्पा लगा हो, लेकिन राहुल गांधी की छवि जातिवादी नहीं है। कांग्रेस यूपी में पिछले 36 साल से सत्ता में नहीं है। मतलब, इन 36 सालों में दो जनरेशन आ चुकी हैं, जिसने कांग्रेस की सरकार नहीं देखी है। इन वोटर्स का झुकाव कांग्रेस की वजह से गठबंधन को मिल सकता है। क्या भाजपा संगठन-सत्ता के दम पर इस चुनौती को बेअसर कर देगी? वरिष्ठ पत्रकार रतन मणि लाल कहते हैं- यूपी विधानसभा चुनाव में अभी 6 महीने से ज्यादा समय है। ऐसे में राहुल गांधी और अखिलेश यादव की जो जुगलबंदी दिल्ली में दिख रही है, वैसा यूपी में भी दिखे, ये कहना जल्दबाजी होगी। लोकसभा 2024 में मिली सफलता के बाद सपा-कांग्रेस ने विधानसभा में भी गठबंधन जारी रखने की बात कही है, लेकिन अभी इसकी अधिकृत घोषणा होनी है। दूसरा कांग्रेस और सपा सबसे पहले शीट शेयरिंग के मसले को सुलझाना होगा। अखिलेश यादव की पार्टी कांग्रेस को ज्यादा सीटें देने का मूड नहीं दिखती, जबकि कांग्रेस अपनी उपस्थिति बढ़ाना चाहती है। ————————– ये खबर भी पढ़ें – सपा के 46 उम्मीदवार लगभग तय, लिस्ट देखिए, पूर्वांचल के चेहरे सबसे ज्यादा; 5 हजार वोट से हारी सीटों पर कैंडिडेट रिपीट होंगे सपा ने विधानसभा चुनाव के लिए 46 सीटों पर कैंडिडेट्स लगभग फाइनल कर दिए हैं। इस लिस्ट में सबसे ज्यादा पूर्वांचल की 19 सीटें हैं। पश्चिम की 13 और मध्य यूपी की 14 सीटों पर उम्मीदवार शामिल किए गए हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, आधिकारिक लिस्ट सितंबर तक जारी की जाएगी। 2022 में सपा जिन 27 सीटों पर 5 हजार से कम वोट मार्जिन से हार गई थी, उनके प्रत्याशियों को अखिलेश यादव दोबारा मैदान पर उतार सकते हैं। पढ़िए पूरी खबर…

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