कौशाम्बी में बुलेरो टेंडर पर बड़ा खेल ? ,21 हजार मासिक भुगतान में दौड़ रहीं सरकारी काम में “प्राइवेट गाड़ियां”
👉 जेम पोर्टल से गर्ग ग्रुप को मिला ठेका, कमर्शियल की जगह प्राइवेट वाहन लगाने के आरोप—सवालों के घेरे में प्रशासन की चुप्पी..
कौशाम्बी। जनपद में सरकारी कार्यों के लिए बुलेरो गाड़ियों के टेंडर को लेकर अब बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। जेम (GeM) पोर्टल के माध्यम से गर्ग ग्रुप एवं एसोसिएट को एक साल के लिए वाहन उपलब्ध कराने का ठेका दिया गया, लेकिन अब इस पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
जानकारी के अनुसार यह कॉन्ट्रैक्ट 6 अगस्त 2025 से 3 सितम्बर 2026 तक प्रभावी है, जिसके तहत कुल 14 बुलेरो गाड़ियां विभिन्न तहसीलों—मंझनपुर, सिराथू और चायल—में तैनात की गई हैं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल भुगतान को लेकर है। सूत्रों के मुताबिक, इन गाड़ियों को मात्र 21,000 रुपये प्रति माह के हिसाब से लगाया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस राशि में यदि ड्राइवर का वेतन, डीज़ल, मेंटेनेंस और अन्य खर्च जोड़ दिया जाए, तो यह दर बेहद अव्यावहारिक प्रतीत होती है। ऐसे में संदेह गहराता है कि आखिर इस दर पर टेंडर कैसे और किन शर्तों पर दिया गया।
यहीं से मामला और गंभीर हो जाता है। आरोप है कि जिस टेंडर में कमर्शियल वाहनों की शर्त होनी चाहिए, उसमें कथित तौर पर प्राइवेट (नॉन-कमर्शियल) वाहन लगाए गए हैं। यदि यह सही है, तो यह न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि राजस्व और सुरक्षा दोनों के लिहाज से बड़ा मुद्दा बन सकता है।
दस्तावेजों में दर्ज कुल 14 वाहन है जिसका नंबर—
UP70HA0259, UP73AD5829, UP73AF4496, UP73Z7269, UP70EE8371, UP73AH0945, UP73AH1697, UP73AC5424, UP73AH1573, UP73AH6585, UP73V5945, UP70HA6754, UP73Y3685, UP70ED9884—अब जांच के दायरे में हैं।
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज है कि क्या इन वाहनों की फिटनेस, परमिट और कमर्शियल रजिस्ट्रेशन की विधिवत जांच की गई थी या नहीं। यदि प्राइवेट गाड़ियों को सरकारी कार्य में लगाया गया है, तो यह सीधा नियमों की अनदेखी माना जाएगा। देख जाए तो जिले के तीनों तहसील में इन वाहनों में एसडीएम से लेकर तहसीलदार और नायब तहसीलदार तक चलते है ।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी कम दर पर टेंडर मिलने के बावजूद क्या कहीं गुणवत्ता और नियमों से समझौता तो नहीं किया गया? और यदि ऐसा हुआ है, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी—ठेकेदार की या फिर संबंधित विभागीय अधिकारियों की?
इस पूरे मामले में प्रशासन की चुप्पी भी संदेह को और गहरा कर रही है। अब आवश्यकता है कि इस टेंडर की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग न हो।
यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला सिर्फ एक टेंडर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करेगा। इसके पहले भी कमर्शियल वाहनों का टेंडर हुआ था जिसमें प्राइवेट वाहन लगाए गए थे। इससे जहां एक तरफ राजस्व की हानि हो रही है वहीं अधिकारी आंख मूंद कर बैठे हैं। इन वाहनों का प्रयोग भी सरकरी अफसरों द्वारा ही किया जा रहा है। यह कहा जाए कि सरकारी सिस्टम का हिस्सा ही सरकार को नुकसान पहुंचा रहा है तो इसमें कोई नई बात नहीं है। अब देखना है कि इस मामले में कोई कार्यवाही होगी या फिर ऐसी ही सब कुछ चलता रहेगा यह एक बड़ा सवाल है….
Amarnath jha Kaushambi -9415254415
