थानों में CCTV, हिरासत और अधिकारों पर बड़ा सवाल: कोर्ट के आदेश बनाम प्रशासनिक निर्देश, आम आदमी की सुरक्षा दांव पर
👉 थानों में CCTV पर बड़ा टकराव , DGP के 2- 3 महीने बनाम सुप्रीम कोर्ट के 18 महीने आदेश…
👉 अवैध हिरासत पर उठे गंभीर सवाल , कौशाम्बी के करारी थाने की कार्यशैली पर आरोप ..
👉 न्यायपालिका सख्त, CJM को निरीक्षण का अधिकार..
👉 मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर मुआवजे तक का आदेश
कौशाम्बी। जिले के थानों में CCTV फुटेज को लेकर बड़ा विरोधाभास सामने आया है। एक ओर डीजीपी स्तर से ढाई तीन महीने तक फुटेज सुरक्षित रखने के निर्देश दिए गए हैं, वहीं सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के अनुसार इसे कम से कम 18 महीने तक संरक्षित रखना अनिवार्य है। 2021 के परम सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह मामले में अदालत ने CCTV के साथ ऑडियो रिकॉर्डिंग, थानों के प्रवेश द्वार, लॉकअप, गैलरी और कार्यालय सहित सभी संवेदनशील स्थानों पर निगरानी और कम से कम 6 महीने तक फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद जून 2025 में जारी सर्कुलर में ढाई महीने तक ही फुटेज रखने की बात कही गई, जिसे कोर्ट के आदेशों के विपरीत माना जा रहा है।

हिरासत और गिरफ्तारी को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 22 के तहत किसी भी व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है। बावजूद इसके अवैध हिरासत की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। कौशाम्बी के करारी थाने की पुलिस पर भी ऐसे ही आरोप लगते रहे हैं कि नियमों का पालन नहीं हो रहा। गिरफ्तारी प्रक्रिया में डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य के दिशा-निर्देश लागू हैं, जिनमें अरेस्ट मेमो, मेडिकल जांच और परिजनों को सूचना देना अनिवार्य है। लेकिन जमीनी स्तर पर अरेस्ट मेमो में हेरफेर और मनमानी के आरोप भी सामने आते हैं, जिससे पारदर्शिता पर सवाल खड़े होते हैं।
न्यायिक निगरानी को मजबूत करने के लिए हाई कोर्ट ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) को यह अधिकार दिया है कि वे किसी भी समय—even अदालती समय के बाद—थानों का निरीक्षण कर सकते हैं और CCTV व्यवस्था की जांच कर सकते हैं। वहीं 2005 के प्रावधानों के तहत मानवाधिकार अदालत भी अवैध हिरासत के मामलों में सीधे हस्तक्षेप कर तत्काल कार्रवाई कर सकती है। प्रशासनिक स्तर पर एसपी और डीएम व्यवस्था का संचालन करते हैं, लेकिन न्यायपालिका भारत का संविधान की सीधी संरक्षक मानी जाती है। न्यायाधीश केवल कर्मचारी नहीं, बल्कि संविधान की आवाज होते हैं और उनके आदेशों की अवहेलना कानून के शासन पर सीधा प्रहार माना जाता है।
अदालतों ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो पीड़ित को मुआवजा देने तक के आदेश दिए जा सकते हैं। इसके साथ ही जिला स्तर पर DLOC (डिस्ट्रिक्ट लेवल ओवरसाइट कमेटी) के गठन, नियमित निरीक्षण और बैठकें कर निगरानी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
इसके बावजूद एक बड़ा सवाल बना हुआ है—जब CCTV फुटेज डिलीट करने का नियंत्रण पुलिस के पास ही रहता है, तो पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित होगी? विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक स्वतंत्र निगरानी, सुरक्षित सर्वर और कड़े अनुपालन की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक आम आदमी की सुरक्षा और उसके मौलिक अधिकार पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो पाएंगे।
Amarnath jha Kaushambi journalist -9415254415
