भरवारी नगर पालिका में नहीं रुक रही मैंन पावर घोटाला की चर्चा ,450 मैनपावर के ठेके पर उठे गंभीर सवाल
कौशाम्बी । नगर पालिका परिषद भरवारी में 450 मैनपावर के ठेके को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। “अर्चना एसोसिएट” नामक एजेंसी को दिए गए इस ठेके में पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि कितने कर्मचारी वास्तव में कार्यरत हैं, इसकी जानकारी तक नगर पालिका परिषद प्रशासन और ठेकेदार देने से बच रहे हैं। सूचना न देने की यह स्थिति अपने आप में बड़े भ्रष्टाचार की ओर इशारा कर रही है।
👉 टेंडर प्रक्रिया पर सवाल, नियमों की अनदेखी का आरोप…
सूत्रों के अनुसार, नगर पालिका द्वारा दिए गए इस ठेके में खुली टेंडर प्रक्रिया अपनाई गई या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है। नियमानुसार किसी भी सरकारी निकाय को ठेका देने से पहले व्यापक प्रचार-प्रसार, प्रतिस्पर्धात्मक बोली प्रक्रिया और पारदर्शी चयन करना अनिवार्य होता है। लेकिन यहां यह सवाल उठ रहा है कि – क्या टेंडर सार्वजनिक रूप से जारी किया गया था? उसमें कितनी कंपनियों ने भाग लिया? चयन किस आधार पर हुआ? यदि यह प्रक्रिया पारदर्शी नहीं रही, तो यह सीधे तौर पर सरकारी खरीद नियमों का उल्लंघन माना जाएगा।
450 मैनपावर या कागजों में खेल?
नगर पालिका में दावा किया जा रहा है कि लगभग 450 कर्मचारी ठेके पर कार्यरत हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इसकी पुष्टि नहीं हो पा रही है।
स्थानीय लोगों और सूत्रों का कहना है कि वास्तविक संख्या कम हो सकती है, कई नाम केवल कागजों में दर्ज हो सकते हैं “घोस्ट कर्मचारी” (फर्जी नाम) के जरिए भुगतान निकाला जा सकता है । अगर ऐसा है, तो यह सीधे तौर पर सरकारी धन के दुरुपयोग का मामला बनता है।
वेतन, EPF और ESI में भी गड़बड़ी की आशंका
कानून के अनुसार ठेका श्रमिकों को न्यूनतम वेतन , EPF (भविष्य निधि) , ESI (स्वास्थ्य बीमा) देना अनिवार्य है।
लेकिन जब कर्मचारियों की वास्तविक संख्या ही स्पष्ट नहीं है, तो यह भी बड़ा सवाल है कि क्या सभी श्रमिकों को पूरा वेतन मिल रहा है?
क्या उनके PF/ESI खाते सक्रिय हैं? या केवल कागजों में भुगतान दिखाकर पैसा निकाला जा रहा है? अनुमान के अनुसार 450 कर्मचारियों पर हर माह 50 लाख रुपये से अधिक खर्च दिखाया जा सकता है—ऐसे में गड़बड़ी की संभावना और भी गंभीर हो जाती है।
सूचना देने से बच रहे अधिकारी, RTI भी बेअसर?
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जब इस पूरे मामले में जानकारी मांगी गई तो ठेकेदार “अर्चना एसोसिएट” ने जानकारी देने से इंकार कर दिया। नगर पालिका के ईओ (Executive Officer) भी स्पष्ट जवाब नहीं दे रहे । यह स्थिति सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम की भावना के खिलाफ है। यदि सरकारी कार्यों में पारदर्शिता होती, तो कर्मचारियों की सूची , भुगतान का रिकॉर्ड , टेंडर दस्तावेज , सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराए जाते।
जांच की मांग तेज, श्रम विभाग की भूमिका अहम
अब इस पूरे मामले में मांग उठ रही है कि जिला श्रम अधिकारी द्वारा ठेका श्रमिकों की जांच की जाए । वेतन रजिस्टर, हाजिरी रजिस्टर और बैंक भुगतान की जांच हो , PF/ESI रिकॉर्ड का सत्यापन कराया जाए
इसके अलावा, शहरी विकास विभाग और उच्च प्रशासन से भी हस्तक्षेप की मांग की जा रही है।
बड़ा सवाल: किसके संरक्षण में चल रहा खेल?
नगर पालिका जैसे छोटे निकाय में इतना बड़ा ठेका बिना उच्च स्तर की जानकारी के संभव नहीं माना जा रहा। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह पूरा खेल अधिकारियों और ठेकेदार की मिलीभगत से चल रहा है, और क्या सरकारी धन का बड़ा हिस्सा कागजों में ही खर्च दिखाया जा रहा है?
भरवारी नगर पालिका का यह मामला केवल एक ठेके तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम में पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। यदि समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह मामला एक बड़े घोटाले के रूप में सामने आ सकता है। अब निगाहें प्रशासन और जांच एजेंसियों पर हैं—क्या सच सामने आएगा या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
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