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आईटीआई और सेवायोजन विभाग में नियुक्तियों पर सवाल: फर्जी स्थानांतरण, भ्रष्टाचार और अरबों का नुकसान,प्रदेश के कई जिले से 438 फर्जी नियुक्ति पर चुप्पी साधे बैठा विभाग

👉 फर्जी स्थानांतरण से अरबों का नुकसान: दोषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं? , शिकायतों और जांच के बाद भी 20 वर्षों से अधूरी कार्रवाई

👉 कविता रानी बर्खास्त, लेकिन अन्य दोषी कर्मचारियों को पदोन्नति ,कौशाम्बी वाइस और निष्पक्ष प्रतिदिन में खबरें छपने के बाद भी सरकार की चुप्पी ,सरकार की साख पर सवाल: कब होगा भ्रष्टाचार का खुलासा?

प्रयागराज। राजकीय आईटीआई में हुए फर्जी नियुक्ति के मामले में कोई कार्यवाही नहीं होने से सरकार पर सवालिया निशान लग रहा है । वर्ष 2003 से 2006 के बीच प्रशिक्षण एवं सेवायोजन विभाग में हुई 438 नियुक्तियों में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं सामने आई थीं। तत्कालीन निदेशक श्री हरिशंकर पांडे ने इन मामलों को प्रमुख सचिव श्रम और व्यावसायिक शिक्षा के समक्ष भेजा था। इन नियुक्तियों में से लगभग 40 लिपिक अभी भी निदेशालय में तैनात हैं। यह अनियमितताएं सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग और शासन की विफलता का बड़ा उदाहरण बन चुकी हैं।

शिकायतों के बावजूद न केवल इन मामलों में कार्रवाई धीमी रही, बल्कि कई महत्वपूर्ण पत्रावलियां भी गायब कर दी गईं। आगरा आईटीआई में तैनात वरिष्ठ सहायक कविता रानी को दोषी पाए जाने पर बर्खास्त किया गया, लेकिन चतुर्थ श्रेणी के अन्य कर्मचारियों, जिनकी नियुक्ति भी संदिग्ध थी, पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके विपरीत, उनकी पदोन्नति कर दी गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि मामले में पक्षपात और भ्रष्टाचार गहराई तक फैला हुआ है।

निदेशालय में तैनात कर्मचारियों ने अपने स्थानांतरण बिना शासन की अनुमति के, स्वयं के अनुरोध पर फर्जी तरीके से करवा लिए। यह स्थानांतरण न केवल विभागीय नियमों का उल्लंघन है, बल्कि भ्रष्टाचार का एक बड़ा जाल भी है। यदि इन स्थानांतरणों की गहन जांच की जाए, तो अरबों रुपए के सरकारी नुकसान का खुलासा हो सकता है।

यह मामला नया नहीं है। पहले भी कौशाम्बी वाइस और निष्पक्ष प्रतिदिन जैसे समाचार पत्रों में इन भ्रष्टाचारों की खबरें प्रकाशित हो चुकी हैं। बावजूद इसके, सरकार और विभाग ने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। यह निष्क्रियता न केवल भ्रष्टाचारियों का मनोबल बढ़ा रही है, बल्कि इससे सरकार की छवि को भी गंभीर नुकसान पहुंच रहा है।

वर्ष 2004 से इस मामले की जांच चल रही है, लेकिन 20 साल बीतने के बाद भी यह अधूरी है। जांच पूरी होने के बावजूद दोषियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। यह दर्शाता है कि प्रशासनिक स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही की गंभीर कमी है।

इस मामले से सरकार को न केवल आर्थिक नुकसान हो रहा है, बल्कि जनता का भरोसा भी उठ रहा है। ऐसे भ्रष्टाचार से सरकारी खजाने को अरबों रुपए का नुकसान हुआ है। जब तक दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं की जाती और फर्जी नियुक्तियों व स्थानांतरण को रद्द नहीं किया जाता, तब तक सरकारी संसाधनों का यह दुरुपयोग जारी रहेगा।

सरकार को अब इस मामले में त्वरित और निर्णायक कदम उठाने की जरूरत है। दोषियों को सजा देने के साथ-साथ, इस भ्रष्टाचार से जुड़े हर पहलू की गहन जांच होनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो न केवल विभागीय भ्रष्टाचार और बढ़ेगा, बल्कि शासन की विश्वसनीयता पर भी गहरा आघात लगेगा। जनता यह सवाल पूछ रही है कि सरकार कब इस गंभीर मामले पर ध्यान देगी और अपने अरबों रुपए बचाने के लिए ठोस कदम उठाएगी।

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