Thu. Oct 22nd, 2020

उत्तर मध्य रेलवे जोन में पिछले 10 वर्षों से चिकित्सा विभाग का है बुरा हाल, कमीशन के चक्कर में लैब में मंगाई जाती है महंगी महंगी मशीनें और जल्दी ही करा दी जाती हैं खराब, नहीं होता है मेंटेनेंस और नही कराया जाता है कंडम,

डॉक्टरों द्वारा मरीजों का नहीं लिखे जाते हैं बीमारी , ओपीडी रजिस्टर में एवं किताबों में भी नहीं किया जाता बिमारी का उल्लेख ।
👉 एक ही डॉक्टर से मरीज ले जाते हैं कई दवाइयां,इससे दवाइयों की खपत में है बढ़ोतरी।
👉 कानपुर में मरीजों को किया जाता है भर्ती ,नहीं रुकते हैं रात में पलंग पर मरीज, नहीं है खाने पीने की है कोई सुविधा।
👉 कागजो में दर्ज होती है मरीजों के गायब होने की घटना, लैब की गुणवत्ता एवं शिकायतों का अंबार । पूरे सप्ताह डॉक्टर एवं सीएलएस को भेजा जा रहा है टूंडला , कानपुर की लाइव को बंद करने की है योजना
👉 सीएमएस के द्वारा किया जा रहा है षड्यंत्र, आउटसोर्सिंग में 60 हजार से बढ़कर 2 लाख40 हजार की हो रही है जांचे, आखिर कब खुलेंगे उच्च अधिकारियों की आंखें ।
👉केंद्रीय चिकित्सालय में नहीं रुक रहा है डॉक्टरों के द्वारा रिफरल का धंधा रिफरल के धंधे में होते हैं मोटा कमीशन बाजी ।
👉हड्डी के केसों में एवं मेडिकल बोर्ड में होती है लाखों की उगाही ।

👉 अधिकारियों की जांचे एवं उनके घरों में डॉक्टरों को भेजते हैं एमडी ।

उत्तर मध्य रेलवे के जोन जोन में पिछले 10 वर्षों से चिकित्सा विभाग का का बुरा हाल है । यहां ना तो मरीजों को भर्ती होने के बाद ठीक से खाना मिलता है और ना ही कोई सुविधाएं मिलती हैं ,जिसके कारण मरीज रात में लिखकर अपने घर को भाग जाते हैं और चिकित्सालय की जांच पर विश्वास मरीजों का उठ चुका है । जिसके कारण मरीज रिफरल होना एवं बाहर इलाज करना ज्यादा पसंद करता है तथा बाहर की लैबो में जांच कराना पसंद करता है । यही कारण है कि दिन प्रतिदिन बजट बढ़ता जा रहा है और रेलवे अस्पताल सफेद हाथी की तरह साबित हो रहा है । इस रिफरल के धंधे में डॉक्टरों को अच्छा खासा मोटा कमीशन मिलता है प्रतिमाह यदि देखा जाए कई लाख का कमीशन डॉक्टरों को एवं फिजीशियन को मिलता है ।

बता दें कि रिफरल किए गए हुए मरीजों को उक्त डॉक्टरों द्वारा संबंधित अस्पतालों में निरीक्षण भी नहीं किया जाता है और घर पर बुलाकर मरीजों को देखा जाता है और वहीं से पैसा लेकर प्राइवेट अस्पतालों में कर दिया जाता है।
बता दें कि प्राइवेट अस्पतालों का इसीलिए भारी-भरकम बिल सरकारी अस्पताल में आता है जो रेलवे राजस्व को भारी भरकम चूना लग रहा है । प्राइवेट अस्पतालों द्वारा भेजे गए कोई और जांच नहीं होती है और उसे सीधा पास कर दिया जाता है । कई वर्षों से खुलेआम यह धंधाा चल रहा है जिस पर रोक लगाने एवं जांच करने की जरूरत है । पिछले कई सालों से हुई प्राइवेट अस्पतालों की इस मनमानी लूट की अगर जांच हुई तो कई डॉक्टरों का खुलासा होना तय है ।

बता दें कि रेलवे अस्पतालों में महंगी -महंगी मसीनो के कमीशन के चक्कर में मंगाई जाती हैं और उनका मेंटेनेंस एवं सामान नहीं मंगाया जाता है जिसके कारण यहांं की मशीनें कूड़ा होकर कंडम करा दी जाती हैं । इसी प्रकार लैब में मशीनें लगाकर उसका मेंटेनेंस नहीं किया जा रहा है जिसके कारण मशीन खराब पडी है और आउट सोर्सिंग को बढावा दिया जा रहा है तथा उल्टी-सीधी रिपोर्ट मरीजों को पकड़ा दी जाती है । जिससे लैब की गुणवत्ता दिन-प्रतिदिन प्रभावित हो रही है और कानपुर सीएमएस आंख पर पट्टी बांधकर बैठे हैं । इसका कोई निराकरण कर रहे हैं इसके पीछे लम्बी साजिश है ।

बता दें कि 7000 की जांचे बढ़कर 2,40000 प्रतिमा पहुंच गई है जिस पर ना तो ऑडिट होती है और ना ही पीसीएमडी को संज्ञान है । पैथोलॉजिस्ट होने के बावजूद कानपुर में लैब पर कोई नियंत्रण नहीं है । इसी तरह आगरा चिकित्सालय में सीएलएस का कोई पद पर तैनाती नहीं है । वहां भी आउटसोर्सिंग से काम चलाया जा रहा हैं । आगरा में कोई नेत्र विशेषज्ञ डॉक्टर भी नहीं है । मंडलीय अस्पताल होने के कारण नेत्र विशेषज्ञ आवश्यक है और मंडी चिकित्सालय कानपुर में नेत्र का इलाज अस्पतालों द्वारा कराया जा सकता है द्वारा ध्यान नहीं दिया जा रहा है और पीसीएमडी भी आंख मूंद कर बैठे है । इसी तरह कानपुर में ह्रदय रोग और न्यूरो का कोई डॉक्टर नहीं है जबकि सबसे ज्यादा मरीज इन्ही बीमारियों के आते हैं और इन्हीं का.रिफरल भी अत्यधिक हो रहा है । इसी तरह दंत चिकित्सक कई वर्षों से द्वितीय पाली में नहीं आती है और सायंकाल ओपीडी में कोई नहीं आता है कोई डॉक्टर नहीं आता है जिसकी शिकायत पूर्व में कई बार किया जा चुका है और पीसीएमडी ने अचानक निरीक्षण भी किया है और मामला सही पाया है । और सीएमएस ने अपने कार्यकाल में किसी भी फार्मासिस्ट का स्थानांतरण इधर से उधर नहीं किया है जिसके कारण लोग 15-20 वर्षों से एक ही स्थान पर जमे हुए हैं ।

मुख्य ख़बरें